संस्कृत श्लोक: "विद्या शस्त्रं च शास्त्रं च द्वे विद्ये प्रतिपत्तये।" का अर्थ और हिन्दी अनुवाद, सुभाषितानि,सुविचार,संस्कृत श्लोक, भागवत दर्शन सूरज कृष
![]() |
संस्कृत श्लोक: "विद्या शस्त्रं च शास्त्रं च द्वे विद्ये प्रतिपत्तये।" का अर्थ और हिन्दी अनुवाद |
श्लोक:
शब्दार्थ:
- विद्या – ज्ञान
- शस्त्रं – अस्त्र-शस्त्र (हथियारों का ज्ञान)
- शास्त्रं – शास्त्र (ग्रंथों का ज्ञान, शास्त्रीय विद्या)
- द्वे विद्ये – दो प्रकार की विद्याएँ
- प्रतिपत्तये – उपलब्धि के लिए, प्राप्ति के लिए
- आद्या – पहली (शस्त्रविद्या)
- हास्याय – हँसी का कारण
- वृद्धत्वे – वृद्धावस्था में
- द्वितीया – दूसरी (शास्त्रविद्या)
- आद्रियते – आदर पाती है
- सदा – सदा, हमेशा
हिन्दी अनुवाद:
विद्या दो प्रकार की होती है—एक शस्त्रविद्या (अस्त्र-शस्त्र संचालन का ज्ञान) और दूसरी शास्त्रविद्या (ग्रंथों का ज्ञान, बौद्धिक विद्या)। ये दोनों ही विद्याएँ मनुष्य को प्रतिष्ठा दिलाती हैं। परंतु पहली विद्या अर्थात शस्त्रविद्या वृद्धावस्था में उपहास का कारण बनती है, जबकि शास्त्रविद्या (बौद्धिक ज्ञान) सदा सम्मानित होती है।
विश्लेषण एवं आधुनिक सन्दर्भ:
१. शस्त्रविद्या बनाम शास्त्रविद्या:
- प्राचीन समय में राजा, योद्धा और क्षत्रिय वर्ग के लिए शस्त्रविद्या अनिवार्य थी। वे धनुर्विद्या, तलवारबाजी, घुड़सवारी, और युद्धनीति में प्रवीण होते थे।
- लेकिन जब व्यक्ति वृद्ध हो जाता है, तो उसका शारीरिक बल क्षीण हो जाता है और वह युद्ध नहीं कर सकता। तब उसकी शस्त्रविद्या केवल अतीत की स्मृति बन जाती है और कभी-कभी लोगों के लिए हास्यास्पद भी लगती है।
- इसके विपरीत, शास्त्रविद्या अर्थात ज्ञान, शास्त्रों का अध्ययन, और बुद्धि से प्राप्त विद्या समय के साथ और अधिक सम्माननीय बनती जाती है। एक वृद्ध व्यक्ति यदि ज्ञानवान हो, तो समाज में उसका सम्मान बढ़ता है।
२. आधुनिक परिप्रेक्ष्य में इस श्लोक की प्रासंगिकता:
- शारीरिक बनाम मानसिक कौशल: आज भी हम देख सकते हैं कि शारीरिक क्षमता पर आधारित पेशे (जैसे खेल, सैन्य सेवा, नृत्य आदि) व्यक्ति की जवानी में उसे प्रसिद्धि दिलाते हैं, परंतु वृद्धावस्था में ये कौशल फीके पड़ जाते हैं।
- बौद्धिक कौशल और उसका सम्मान: शिक्षक, लेखक, वैज्ञानिक, विचारक, और आध्यात्मिक गुरु वृद्धावस्था में भी सम्मान पाते हैं क्योंकि उनका ज्ञान और अनुभव समाज के लिए उपयोगी बना रहता है।
- प्रौद्योगिकी और ज्ञान का महत्व: आज के युग में तकनीकी और वैज्ञानिक ज्ञान का महत्व अधिक बढ़ गया है। वे व्यक्ति जो ज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं, वे जीवनभर सम्मानित रहते हैं। उदाहरण के लिए, वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग, दलाई लामा, और कई अन्य विचारक वृद्धावस्था में भी प्रतिष्ठित रहे।
३. शिक्षा की दिशा:
- इस श्लोक से यह शिक्षा मिलती है कि हमें केवल शारीरिक बल और बाहरी कौशल पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि बौद्धिक विकास और ज्ञानार्जन पर भी ध्यान देना चाहिए।
- विद्यार्थी जीवन में ही यह समझना आवश्यक है कि शास्त्रविद्या (बुद्धि, विवेक, शास्त्रों का ज्ञान, तार्किक सोच) का महत्व जीवनभर बना रहता है।
विद्या की सच्ची प्रतिष्ठा
प्राचीन भारत में अमरसिंह नामक एक पराक्रमी योद्धा रहता था। वह तलवारबाजी, धनुर्विद्या और युद्धकला में निपुण था। उसकी वीरता के किस्से दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। जब वह युद्ध के मैदान में उतरता, तो शत्रु भय से कांप उठते। राजा भी उसकी वीरता से प्रभावित होकर उसे सेनापति बना चुके थे।
इसी राज्य में विप्रदत्त नामक एक विद्वान ब्राह्मण भी रहते थे। वे वेद, शास्त्र, नीति, काव्य और तर्कशास्त्र में निपुण थे। उनके विचारों से राजा और प्रजा सभी प्रभावित रहते। वह एक साधारण व्यक्ति की तरह रहते, किंतु जब भी राजसभा में नीति या धर्म पर चर्चा होती, तो सभी उनकी विद्वत्ता के आगे नतमस्तक हो जाते।
समय बीतता गया। धीरे-धीरे अमरसिंह वृद्ध हो गया। उसके हाथ पहले जैसे शक्तिशाली नहीं रहे, पैर काँपने लगे और उसकी दृष्टि भी कमजोर पड़ने लगी। राजा ने उसे सम्मानपूर्वक सेनापति पद से निवृत्त कर दिया। अब वह दरबार में केवल एक सम्मानित अतिथि के रूप में जाता था।
यह सुनकर अमरसिंह को बहुत दुःख हुआ। जिन शस्त्रों ने उसे जीवनभर प्रतिष्ठा दिलाई थी, अब वे ही उपहास का कारण बन रहे थे।
उसी समय राजा ने दरबार में विप्रदत्त जी को आमंत्रित किया। वे जैसे ही सभा में आए, सभी दरबारियों ने उठकर उनका सम्मान किया। राजा ने स्नेहपूर्वक उन्हें उच्च आसन पर बिठाया और किसी जटिल विषय पर उनके विचार मांगे। विप्रदत्त ने अपने ज्ञान के आधार पर ऐसा उत्तर दिया कि सभी लोग प्रभावित हो गए।
"शस्त्रविद्या केवल यौवन तक सम्मान दिलाती है, किंतु शास्त्रविद्या जीवनभर पूजनीय रहती है। इसलिए यदि व्यक्ति सच्चा सम्मान चाहता है, तो उसे ज्ञानार्जन में भी समय देना चाहिए।"
इसके बाद अमरसिंह ने स्वयं वेद-शास्त्रों का अध्ययन किया और धीरे-धीरे वे भी राजा के प्रमुख सलाहकार बन गए। उनकी प्रतिष्ठा पुनः स्थापित हुई, लेकिन इस बार शस्त्रों के कारण नहीं, बल्कि शास्त्रों के कारण।
शिक्षा:
- शारीरिक बल और शस्त्रविद्या केवल कुछ समय तक सम्मान दिलाते हैं, लेकिन बौद्धिक ज्ञान सदा प्रतिष्ठा देता है।
- वृद्धावस्था में वही व्यक्ति सम्मान पाता है जिसने ज्ञान और अनुभव को अर्जित किया हो।
- हमें शारीरिक कौशल के साथ-साथ बौद्धिक क्षमता का भी विकास करना चाहिए।
निष्कर्ष:
इस श्लोक का गूढ़ अर्थ यही है कि ज्ञान का सम्मान कभी कम नहीं होता, जबकि शारीरिक शक्ति पर आधारित विद्या समय के साथ कमजोर पड़ जाती है। इसलिए मनुष्य को केवल शस्त्रविद्या (शारीरिक कौशल) पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि शास्त्रविद्या (ज्ञान और बुद्धिमत्ता) को भी अपनाना चाहिए, क्योंकि यही जीवनभर सम्मान और प्रतिष्ठा दिलाती है।
"ज्ञान ही सच्ची संपत्ति है, जो जीवन के हर चरण में उपयोगी होती है।"
bahu shobhanam
ReplyDeleteधन्यवाद🙏💕
ReplyDelete