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भागवत कथा: श्रीमद्भागवत में कलियुग के लक्षण |
भागवत कथा: श्रीमद्भागवत में कलियुग के लक्षण
श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वादश स्कंध (अध्याय 2 और 3) में कलियुग के लक्षणों का विस्तार से वर्णन किया गया है। यह युग अधर्म, अज्ञान, और पतन से भरा होगा, जहाँ धर्म के चार पाद (सत्य, तप, शौच, और दया) क्षीण हो जाएंगे। मनुष्य का जीवन, विचार और आचरण अत्यंत पतित हो जाएगा।
कलियुग के लक्षण
1. धर्म और सत्कर्मों का पतन
कलियुग में धर्म के चार स्तंभ—सत्य, तप, शौच और दया—का ह्रास होगा। पाप और अधर्म का वर्चस्व बढ़ेगा।
श्लोक:धर्मं चतुर्भगवतस्त्रयोऽधर्मस्य हेतवः।सत्यं शौचं दया क्षान्तिस्त्यागो ह्रीः सन्नतिः शमः॥(श्रीमद्भागवत 12.2.1)
अर्थ: "कलियुग में धर्म क्षीण हो जाता है और अधर्म का प्रभुत्व बढ़ जाता है। सत्य, शुद्धता, दया और क्षमा लुप्तप्राय हो जाते हैं।"
2. लोभ और स्वार्थ का वर्चस्व
कलियुग में मनुष्य केवल धन और स्वार्थ के पीछे भागेगा। धन को ही धर्म माना जाएगा।
श्लोक:धर्मं केवलमर्थाय उपदेश्यन्ति विप्रजाः।धर्मन्यायविरुद्धेभ्यः क्षौद्रेष्वपि नियोजयन्॥(श्रीमद्भागवत 12.2.2)
अर्थ: "धन को ही धर्म समझा जाएगा और लोग लोभ के कारण धर्म का स्वरूप बदल देंगे।"
3. शारीरिक और मानसिक दुर्बलता
कलियुग में मनुष्य का शारीरिक बल, आयु और स्मरणशक्ति घट जाएगी।
श्लोक:ततोऽनुदिनमधर्मः सत्यम् शौचं क्षमादयः।कलौ सपत्यायन्ते बालानां चायुषः स्मयम्॥(श्रीमद्भागवत 12.2.2)
अर्थ: "कलियुग में सत्य, शुद्धता और क्षमा का ह्रास होता है, और मनुष्य की आयु कम हो जाती है।"
4. परस्पर द्वेष और ईर्ष्या
मनुष्य अपने ही सगे-संबंधियों और मित्रों से ईर्ष्या करेगा। समाज में बैर और शत्रुता बढ़ जाएगी।
श्लोक:दास्युत्तः स्वामिनो दासी स्वामी दास्यां च मैथुनः।मारीचः क्रोधभूतश्च कलिकालानुगः स्मयः॥(श्रीमद्भागवत 12.2.3)
अर्थ: "स्वामी और सेवक के संबंधों में भी बैरभाव बढ़ जाएगा और क्रोध तथा ईर्ष्या का वर्चस्व होगा।"
5. अधर्म का प्रसार
सत्य को असत्य और असत्य को सत्य माना जाएगा। अधर्म समाज में प्रतिष्ठा पाएगा।
श्लोक:धर्मं वै यत्र पापेन सत्यं यत्रानृतेन च।सद्भावं यत्र मायाभिरज्ञानं यत्र विद्यया॥(श्रीमद्भागवत 12.3.33)
अर्थ: "अधर्म को धर्म और असत्य को सत्य मान लिया जाएगा। कपट और अज्ञान को समाज में सम्मान मिलेगा।"
6. स्त्रियों और ब्राह्मणों का पतन
स्त्रियां और ब्राह्मण अपने सत्व और आचरण से गिर जाएंगे।
श्लोक:ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रास्त्र्यः पतयो यथा।अभ्युत्थिते कलौ सर्वे गुणहीना भवन्ति हि॥(श्रीमद्भागवत 12.2.5)
अर्थ: "कलियुग में सभी वर्ण और वर्ग अपने धर्म और गुणों से गिर जाएंगे।"
7. धन ही प्रतिष्ठा का आधार बनेगा
मनुष्य की प्रतिष्ठा उसके धन से आंकी जाएगी। धर्म, ज्ञान और सद्गुणों का कोई मूल्य नहीं रहेगा।
श्लोक:धनं एव कलौ नृणां जन्माचारगुणोद्यमः।धर्मन्यायविरुद्धेभ्यः क्षौद्रेष्वपि नियोजयन्॥(श्रीमद्भागवत 12.2.6)
अर्थ: "धन ही मनुष्य के आचरण, गुण और प्रतिष्ठा का मापदंड होगा।"
8. वैवाहिक संबंधों में गिरावट
विवाह केवल कामवासना पूर्ति के लिए होंगे। दांपत्य जीवन में प्रेम और धर्म की कमी होगी।
9. धर्म का सच्चा मार्ग दुर्लभ होगा
लोग धर्म के नाम पर पाखंड करेंगे। सच्चे धर्म का मार्ग धुंधला हो जाएगा।
10. जीवन का संक्षेप और भयावहता
मनुष्य का जीवन अत्यंत छोटा, कष्टमय और अशांत होगा।
कलियुग से मुक्ति का उपाय
हालांकि कलियुग में दोषों की अधिकता है, फिर भी इसमें एक महान गुण है—भगवान श्रीकृष्ण के नाम का कीर्तन ही मुक्ति का सबसे सरल मार्ग है।
श्लोक:कलेर्दोषनिधे राजन् अस्ति ह्येको महान् गुणः।कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्॥(श्रीमद्भागवत 12.3.51)
अर्थ: "कलियुग में, जो दोषों से भरा हुआ है, उसमें एक महान गुण है। भगवान श्रीकृष्ण का कीर्तन करने मात्र से जीव समस्त बंधनों से मुक्त होकर परम पद प्राप्त कर सकता है।"
निष्कर्ष
कलियुग के लक्षण हमें चेताने के लिए हैं। यह युग अधर्म, लोभ, और अज्ञान से भरा है, लेकिन भगवान के नाम का स्मरण और भक्ति इसे पार करने का सरल उपाय है।
श्रीमद्भागवत हमें सिखाता है कि जीवन में सच्चा सुख और शांति केवल भगवान की शरण में है।
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