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भागवत दर्शन: मार्कंडेय ऋषि को माया दर्शन |
भागवत दर्शन: मार्कंडेय ऋषि को माया दर्शन
(श्रीमद्भागवत महापुराण, द्वादश स्कंध, अध्याय 8-10)
यह प्रसंग भगवान विष्णु की माया शक्ति और संसार की असारता को उजागर करता है। भगवान ने ऋषि मार्कंडेय को यह दिखाने के लिए अपनी माया का अनुभव कराया कि ब्रह्मांड में सब कुछ क्षणभंगुर और नश्वर है, केवल भगवान ही शाश्वत और सत्य हैं।
कथा का प्रसंग
1. मार्कंडेय ऋषि की तपस्या
ऋषि मार्कंडेय अपने तप, ज्ञान और भक्ति के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने भगवान विष्णु की तपस्या करते हुए यह इच्छा प्रकट की कि वे उनकी माया को प्रत्यक्ष रूप से देखना चाहते हैं।
श्लोक:तां मया दर्शनं देव दास्यसे यदि मे वरम्।मम ब्रह्मात्मविद्यानां मेधायां च प्रसीद हे॥(श्रीमद्भागवत 12.8.1-2)
अर्थ: "हे देव! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो कृपया मुझे अपनी माया का दर्शन कराएं ताकि मैं इसे समझ सकूं।"
भगवान ने उनकी प्रार्थना सुनकर उनकी इच्छा को स्वीकार किया।
2. भगवान की माया का प्रकट होना
भगवान विष्णु ने अपनी योगमाया से संसार के विनाश का दृश्य प्रकट किया। मार्कंडेय ऋषि ने देखा कि प्रलयकाल में संपूर्ण ब्रह्मांड जल में डूब गया है। आकाश में केवल अंधकार है और चारों ओर प्रलय की लहरें उठ रही हैं।
श्लोक:ततोऽभ्यगृह्णाच्छरणं कालेन भक्षितं जगत्।समुद्धृतं तया नित्यं मायया प्रभविष्णया॥(श्रीमद्भागवत 12.8.7)
अर्थ: प्रलय के दौरान संपूर्ण जगत भगवान की माया द्वारा निगल लिया गया और सब कुछ जल में समा गया।
3. प्रलयकाल का अनुभव
मार्कंडेय ऋषि स्वयं प्रलय के जल में बहने लगे। उन्हें भय, क्लांति और भूख-प्यास से पीड़ित होना पड़ा। चारों ओर जल ही जल था, और उन्हें कहीं शांति नहीं मिल रही थी।
श्लोक:अल्पकृत्यः स विद्वांसः शीतोष्णक्लेशपीडितः।प्रलयाम्भोधिमध्यस्थो भ्रमण्तं त्वात्मनः क्षयम्॥(श्रीमद्भागवत 12.8.14)
अर्थ: प्रलय के मध्य ऋषि मार्कंडेय क्लांत और असहाय हो गए। वे जल के बीच बह रहे थे और अपनी रक्षा के लिए व्याकुल हो गए।
4. भगवान के बाल रूप का दर्शन
अचानक, मार्कंडेय ऋषि ने प्रलय के जल में एक आश्चर्यजनक दृश्य देखा। उन्होंने एक बरगद के पत्ते पर शिशु रूप में भगवान विष्णु को देखा। भगवान ने अपने छोटे-छोटे हाथों से अपने पैर के अंगूठे को मुंह में रखा हुआ था और एक निर्दोष मुस्कान उनके चेहरे पर थी।
श्लोक:पद्मकोशारुणं चारु चक्षुर्विशालमक्षमम्।वृक्षमूलं समाश्रित्य तिष्ठन्तं शिशुरूपिणम्॥(श्रीमद्भागवत 12.8.16)
अर्थ: भगवान शिशु रूप में पत्ते पर लेटे हुए थे और उनके मुखमंडल की सुंदरता ऋषि मार्कंडेय को विस्मित कर रही थी।
5. भगवान की माया का अंत
भगवान ने ऋषि को उस शिशु रूप में अपनी माया के दर्शन कराए। इसके बाद, उन्होंने मार्कंडेय को उस जल से बाहर निकाला और उनकी माया का प्रभाव समाप्त किया। भगवान ने उन्हें बताया कि यह उनकी योगमाया थी, जिसे सामान्य व्यक्ति नहीं समझ सकते।
श्लोक:इत्युक्त्वा भगवान्साक्षान्मार्कण्डेयाय वै प्रभुः।मायां स्वां दर्शयामास नष्टमायः प्रपूजितः॥(श्रीमद्भागवत 12.8.23)
अर्थ: भगवान ने कहा, "हे मार्कंडेय! यह मेरी माया है। इसे केवल मेरे भक्त ही समझ सकते हैं। अब तुम मेरे दर्शन से मुक्त हो।"
महत्व और संदेश
1. माया की असारता
यह कथा सिखाती है कि संसार और उसकी सारी चीजें भगवान की माया का ही खेल हैं। यह माया अत्यंत प्रभावशाली है, लेकिन इसे केवल भगवान की कृपा से ही पार किया जा सकता है।
2. भगवान की शरण ही अंतिम उपाय है
मार्कंडेय ऋषि ने प्रलयकाल में अनुभव किया कि भगवान की शरण के बिना जीवन असहाय और दुखमय है।
3. भगवान का अनंत स्वरूप
भगवान शिशु रूप में बरगद के पत्ते पर लेटे हुए थे। यह दर्शाता है कि भगवान सृष्टि के रचयिता और संहारक दोनों हैं और उनकी लीला असीमित है।
4. भक्ति का महत्व
भगवान ने ऋषि मार्कंडेय को यह सिखाया कि केवल भक्ति और आत्मसमर्पण से ही व्यक्ति भगवान की माया से मुक्त हो सकता है।
निष्कर्ष
मार्कंडेय ऋषि को माया दर्शन की कथा आत्मज्ञान और भक्ति का गहरा संदेश देती है। यह हमें सिखाती है कि संसार के सारे बंधन, सुख-दुख और भय भगवान की माया का ही परिणाम हैं। जब हम भगवान की शरण में जाते हैं और उनकी भक्ति करते हैं, तो यह माया हमें स्पर्श नहीं कर सकती।
इस कथा का मुख्य उद्देश्य हमें भगवान की शाश्वतता और माया की क्षणभंगुरता का बोध कराना है।
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