Secure Page

Welcome to My Secure Website

This is a demo text that cannot be copied.

No Screenshot

Secure Content

This content is protected from screenshots.

getWindow().setFlags(WindowManager.LayoutParams.FLAG_SECURE, WindowManager.LayoutParams.FLAG_SECURE); Secure Page

Secure Content

This content cannot be copied or captured via screenshots.

Secure Page

Secure Page

Multi-finger gestures and screenshots are disabled on this page.

getWindow().setFlags(WindowManager.LayoutParams.FLAG_SECURE, WindowManager.LayoutParams.FLAG_SECURE); Secure Page

Secure Content

This is the protected content that cannot be captured.

Screenshot Detected! Content is Blocked

ON SPOT$type=blogging$m=0$cate=0$sn=0$rm=0$c=2$va=0

Search This Blog

भारतीय इतिहास: विदेशी यात्रियों की नजर में भारत

SHARE:

भारतीय इतिहास: विदेशी यात्रियों की नजर में भारत, मेगस्थनीज (350 – 290 ई. पू.),फाह्यान (337 – 422 ई.),अल-बरूनी (973–1048 ई.),इतिहास के लाभ, भागवत दर्शन

भारतीय इतिहास: विदेशी यात्रियों की नजर में भारत
भारतीय इतिहास: विदेशी यात्रियों की नजर में भारत


भारतीय इतिहास: विदेशी यात्रियों की नजर में भारत

मध्यकालीन भारत के बारे में जिन विदेशियों ने भारत संबंधी कुछ विवरण लिखित रूप में छोड़ा, उनमें तीन लोगों का विशेष महत्व है – यूरोप का मेगस्थनीज, चीन का फाह्यान  और अरब का अल- बिरूनी । इनमें सबसे पुराना मेगस्थनीज (ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी) और सबसे बाद का अल-बिरूनी (ईसा की ग्यारहवीं शताब्दी) है । अतः इन यात्रियों के विवरण से भारत के लगभग डेढ़ हजार वर्ष के इतिहास के कुछ पहलू सामने आ जाते हैं । यह ध्यान देने योग्य है कि इन यात्रियों के विवरणों का परिचय प्राप्त करने के लिए हम उनके मूल ग्रंथों के बजाय अंग्रेजी अनुवाद पर निर्भर रहे हैं । यह अंग्रेजी के प्रति हमारे मोह और  विश्व की अन्य प्रमुख भाषाओं के प्रति उदासीनता का एक उदाहरण है ।

मेगस्थनीज (350 – 290 ई. पू.)

मेगस्थनीज वैसे तो ग्रीक विद्वान था, पर उसका जन्म एशिया माइनर (वर्तमान तुर्की) में हुआ था । भारत में वह सम्राट चंद्रगुप्त के दरबार में राजदूत के रूप में आया था । हमारे  इतिहास में यों तो चंद्रगुप्त नाम से कई सम्राट हुए हैं, पर मध्यकालीन भारत में चंद्रगुप्त नाम के जिन दो सम्राटों का विशेष महत्व है उनमें से एक का सम्बन्ध प्रसिद्ध विद्वान चाणक्य के शिष्य और मौर्य वंश के संस्थापक से है, तो दूसरे का गुप्त वंश के संस्थापक से । इनमें मेगस्थनीज का सम्बन्ध किस चंद्रगुप्त से है, इस विषय में इतिहासकार एकमत नहीं हैं । अधिकतर विद्वान जहाँ इसे चंद्रगुप्त मौर्य से जोड़ते हैं, वहीँ कुछ विद्वानों का कहना है कि मेगस्थनीज ने अपने वर्णन में सम्राट का नाम “ सैंड्रोकोटस “ (Sandrakottos)  लिखा है और उसके पुत्र का नाम सैमड्राकिपटस (Samdrakyptos) लिखा है जो क्रमशः चंद्रगुप्त और समुद्रगुप्त (गुप्तवंश के संस्थापक चंद्रगुप्त का पुत्र) के ग्रीक उच्चारण लगते हैं, चंद्रगुप्त मौर्य के पुत्र का नाम तो बिम्बसार / बिन्दुसार था । इसके अतिरिक्त, मेगस्थनीज ने न तो कहीं “ मौर्य “ शब्द का उल्लेख किया, और न चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु / प्रधानमंत्री चाणक्य का कोई ज़िक्र किया जिनके बिना चन्द्रगुप्त मौर्य की चर्चा अधूरी लगती है । इतिहासकारों के पास इस विषय में विवाद के अन्य भी कुछ तर्क हैं, पर मेगस्थनीज़ भारत में रहा – इस पर किसी को संदेह नहीं है ।

 कहते हैं कि सिकंदर – पुरु युद्ध (326 ई.पू.) के लगभग बीस वर्ष बाद 305 ई. पू. में सिकंदर के एक सेनापति सेल्यूकस – प्रथम ने भारत पर पुनः आक्रमण करने का दुस्साहस किया । अब उसका सामना सम्राट चंद्रगुप्त से हुआ । युद्ध में उसकी करारी हार हुई और उसे संधि करने के लिए विवश होना पड़ा जिसके अनुसार उसने अपनी बेटी का विवाह चंद्रगुप्त से कर दिया, और मेगस्थनीज को अपना राजदूत बनाकर चंद्रगुप्त के दरबार में नियुक्त कर दिया । मेगस्थनीज भारत में कितने समय रहा, इस बारे में निश्चित रूप से कुछ पता नहीं । भारत में उसने जो कुछ देखा – सुना और अनुभव किया उसके आधार पर उसने चार खण्डों में एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था “ इंडिका “ ; यह पुस्तक उसने भारत में रहते हुए लिखी या बाद में, यह भी नहीं पता । ऐसा प्रतीत होता है कि उस युग में यूरोप में पुस्तकों को सुरक्षित रखने की न तो ठीक व्यवस्था थी, और न पूरे-पूरे ग्रन्थ कंठस्थ करने की जैसी परम्परा भारत में विकसित हुई, वैसी परंपरा वहां कभी रही । इसका परिणाम यह हुआ कि मेगस्थनीज के लगभग चार सौ वर्ष बाद ग्रीक इतिहासकार एरियन ( जन्म – मृत्यु का समय विवादास्पद : 86 – 160 ई. अथवा 95 – 175 ई.)  ने जब सिकंदर की गाथा “ इंडिका “ नाम से ही लिखने का निश्चय किया, तो उसे मेगस्थनीज की इंडिका खोजने पर भी नहीं मिली । बस यत्र – तत्र उसके अनेक  उद्धरण / सारांश अन्य ग्रीक लेखकों की पुस्तकों में मिले, उन्हीं का उपयोग उसने अपनी पुस्तक में किया । बाद में 19 वीं शताब्दी में इन्हीं उद्धरणों का क्रमबद्ध संकलन करके डा. श्वानबेक ने जर्मन भाषा में एक ग्रन्थ तैयार किया जिसका कालांतर में अंग्रेजी अनुवाद जे एम मैकक्रिंडेल ने किया । इस प्रकार संकलित / अनूदित रूप में जो ग्रन्थ तैयार हुआ उसका नाम है, “ एंशिएंट इंडिया एज़ डिस्क्राइब्ड बाई मेगस्थनीज एंड एरियन “। आज वस्तुतः इसी ग्रन्थ के आधार पर मेगस्थनीज के विचार / उद्धरण दिए जाते हैं (इंडिका नाम से एक तीसरी पुस्तक भी है पर वह अलबिरुनी के ग्रन्थ “किताब-उल-हिंद “ पर आधारित है, उसका मेगस्थनीज से कोई सम्बन्ध नहीं) ।

 जिसे इन विद्वानों ने “ एंशिएंट इंडिया “ (प्राचीन भारत) कहा है, उसे वस्तुतः प्राचीन नहीं, मध्यकालीन कहना चाहिए क्योंकि हमारा इतिहास तो बहुत पुराना है । भारतीय इतिहासकारों के अनुसार पांच हजार वर्ष तो महाभारत काल को ही हो चुके, रामायणकाल उससे भी बहुत पहले का है, और सिन्धुघाटी और वैदिक युग और भी पुराना, (इसे सिद्ध करने के लिए भारतीय इतिहासकार अनेक प्रमाण देते हैं), जबकि विदेशी इतिहासकार मेगस्थनीज के जिस समय की बात कर रहे हैं वह तो उनके अनुसार ही अब से लगभग सवा दो हजार वर्ष पहले की बात है, तो उसे “ प्राचीन ” कैसे कह सकते हैं ?  इसके अतिरिक्त यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि विदेशी इतिहासकारों ने अपनी समझ के अनुसार भारतीय इतिहास का कालक्रम निर्धारित कर तो दिया, पर उसकी अनेक विसंगतियाँ अब उजागर होती जा रही हैं । उदाहरण के लिए, उन्होंने गौतम बुद्ध का समय ईसा से लगभग 500 वर्ष पूर्व  निर्धारित किया है, जबकि चीन के विद्वानों का यह मानना है (और वे इसके प्रमाण देते हैं) कि चीन में बौद्ध धर्म ईसा से लगभग 1100 – 1200  वर्ष पूर्व पहुँच चुका था जिसका स्पष्ट अर्थ है कि गौतम बुद्ध का समय ईसा से कम से कम डेढ़ – दो हजार वर्ष पहले होना चाहिए ; पर विदेशी इतिहासकारों की “ जिद “ थी कि पूरे विश्व के इतिहास को लगभग पांच हजार साल में समेटना है क्योंकि वे जिस ईसाई धर्म के अनुयायी थे उसकी मान्यता के अनुसार सृष्टि का निर्माण ईसा पूर्व 23 अक्टूबर 4004  को  प्रातःकाल 9.00  बजे हुआ था । मानव सभ्यता विकसित होने में भी समय लगा. अतः जब इस दुनिया को बने ही लगभग छह हजार साल हुए हैं, तो इतिहास उससे अधिक पुराना कैसे हो सकता है ? यों इस कसौटी पर भी मेगस्थनीज़ का समय मध्यकाल ही ठहरता है, प्राचीनकाल नहीं ।

अस्तु, काल निर्धारण की इस गुत्थी को यहीं छोड़ हम मेगस्थनीज के नाम से मिले भारत विवरण को जानें I

 मेगस्थनीज के विवरण से हमें भारत के साथ – साथ तत्कालीन यूरोप के बारे में भी कई जानकारियाँ मिलती हैं । जैसे, उस समय यूरोप के लोग गन्ने और कपास की खेती से बिलकुल अनभिज्ञ थे, इसीलिए मेगस्थनीज ने भारत में गन्ने के गुड़ को देखकर आश्चर्य से लिखा कि “ यहाँ बिना शहद की मक्खियों के भी शहद तैयार होता है। ” इसी तरह कपास देखकर लिखा कि “ भारत में पौधों से वनस्पति – ऊन तैयार की जाती है। ” यूरोप में तब दास प्रथा प्रचलित थी, और दासों के भी दो वर्ग थे slaves (दास) और Helots (अधिदास) ; जबकि भारत में यह प्रथा सर्वथा अज्ञात थी ।  अतः मेगस्थनीज को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि “ भारत में कोई दास नहीं, सब लोग स्वतंत्र हैं। ” यूरोप में लोगों के देहांत के बाद उनका स्मारक बनाने की प्रथा थी जो कब्र के रूप में अब तक मौजूद है ; भारत में मेगस्थनीज ने देखा कि यहाँ भौतिक स्मारक बनाने का रिवाज ही नहीं, लोग आदरपूर्वक उस व्यक्ति के गुणों का स्मरण करते हैं, उन गुणों का बखान करते हैं, उन गुणों के “ गीत “ गाते हैं । ये गुण ही उस व्यक्ति का स्मारक होते हैं । यूरोप में अनेक बार अकाल पड़ते थे, मेगस्थनीज को विस्मय हुआ कि भारत में अकाल ही नहीं पड़ता क्योंकि यहाँ ऐसी आपदा से बचने के उपाय पहले से ही कर लिए जाते थे ।

 भारत की सामाजिक स्थिति के बारे में मेगस्थनीज ने कतिपय ऐसी बातें भी लिखी हैं जिन्हें पढ़कर आज के माहौल में हमारी आँखें भी खुली की खुली रह जाती हैं । उसने बताया है कि लोग शराब नहीं पीते । वे बहुत ईमानदार, सदाचारी और धर्मपरायण हैं । यहाँ लिखित दस्तावेजों के बजाय मौखिक बातों पर विश्वास किया जाता है । ऋण लेने के लिए किसी की गवाही या वचनपत्र की आवश्यकता नहीं । क़ानून लिखित नहीं है, पर कठोर है। घरों में ताले नहीं लगाए जाते, फिर भी चोरी की कोई वारदात नहीं होती । झूठी गवाही देने पर अंगविच्छेद की सजा दी जाती है । भारत की नदियाँ स्वच्छ हैं, बहुत बड़ी हैं और जहाजरानी के काम आती हैं । गंगा और सिंधु नदियां तो मिस्र की नील नदी से भी बड़ी हैं ।

फाह्यान (337 – 422 ई.) 

 मेगस्थनीज के लगभग छह सौ वर्ष बाद चीनी यात्री फाह्यान भारत आया और यदि पश्चिमी इतिहासकारों द्वारा निर्धारित कालनिर्णय प्रामाणिक माना जाए तो फाह्यान 400 ईसवी में ( अर्थात गौतम बुद्ध के देहांत के लगभग 900 वर्ष बाद  ) भारत आया । अनुमान है कि वह 405  ई. से 411 ई. तक अर्थात लगभग छह वर्ष भारत में रहा । यहाँ उस समय गुप्तवंश के चंद्रगुप्त द्वितीय (380 – 412 ई.) का शासन था । स्वयं फाह्यान के बारे में कोई उल्लेखनीय जानकारी अन्य स्रोतों से उपलब्ध नहीं, अतः भारत के बारे में उसने जो ग्रन्थ लिखा वही मानों उसका स्मारक है । फाह्यान जब चीन से भारत के लिए स्थल मार्ग से चला तो उसके साथ पांच और भिक्षु भी थे, पर दो भिक्षु तो मार्ग की कठिनाइयां न झेल पाने के कारण बीच रास्ते से ही वापस लौट गए, दो का रास्ते में देहांत हो गया, जो एक बचा वह बाद में स्थायी रूप से भारत में ही बस गया । अतः वापसी यात्रा फाह्यान को अकेले ही करनी पड़ी जो उसने जलमार्ग से की ।

फाह्यान ने भारत आकर संस्कृत भाषा का अध्ययन किया क्योंकि वह बौद्ध धर्म से संबंधित विभिन्न ग्रंथों की, विशेष रूप से “ विनय पिटक ” (बुद्ध द्वारा निर्धारित नियम पुस्तक) की  “ शुद्ध एवं प्रामाणिक प्रति “ प्राप्त करना चाहता था । यह ध्यान देने योग्य है कि यों तो बौद्ध धर्म से संबंधित तमाम साहित्य पालि भाषा में लिखा गया जो तत्कालीन समाज की लोकभाषा थी, गौतम बुद्ध ने अपने उपदेश भी पालि में ही दिए ; पर लोकभाषा में एकरूपता कम, विविधता अधिक होती  है, मानकता की कमी होती है, एक ही वस्तु के लिए अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नाम होते हैं, और अनेक बार एक ही शब्द का अलग-अलग स्थानों पर अर्थ बदल जाता है । अतः शुद्ध और प्रामाणिक प्रति प्राप्त करने के लिए फाह्यान को संस्कृत का सहारा लेना पड़ा । इससे यह भी पता चलता है कि हमारे देश में संस्कृत को विशेष सम्मान क्यों दिया जाता है, उसे “ भारत की सांस्कृतिक भाषा / भारतीय संस्कृति की प्रतीक “ क्यों कहा जाता है। संस्कृत के इसी महत्व के कारण भारतीय ज्ञान-विज्ञान से परिचित होने के इच्छुक अन्य विदेशी यात्रियों ने भी यहाँ आकर संस्कृत का अध्ययन कियाI

फाह्यान के यात्राविवरण के अंग्रेजी रूपांतर का नाम है A Record of Buddhist Kingdoms, Being an Account by the Chinese Monk Fa-Xian of his Travels in India and Ceylon in Search of the Buddhist Books of Discipline यद्यपि फाह्यान ने भगवान बुद्ध से संबंधित स्थानों का ही वर्णन किया है, फिर भी इससे पांचवीं सदी के भारत के जनजीवन का भी पता चलता है । 

फाह्यान ने भारतीयों के सदाचार और परोपकारी वृत्ति की बहुत प्रशंसा की है । उसने लिखा है कि भारतीय सात्विक भोजन करते हैं, प्याज – लहसुन तक नहीं खाते, मांसाहार और मदिरापान करने का तो प्रश्न ही नहीं, इसलिए बाजार में मांस की दुकानें और मदिरालय नहीं हैं (यह बात विशेष ध्यान देने की है क्योंकि कहा जाता है कि यज्ञों में पशुबलि के विरोध में ही बौद्ध और जैन मतों का उदय हुआ जिनमें से बौद्ध मतानुयायी तो अब घोषित रूप से मांसाहारी ही हैं) ।  केवल “ चांडाल ” लोग आखेट करते हैं और मांस खाते हैं । इसी कारण उन्हें नगर में रहने की अनुमति नहीं है, वे नगर के बाहर रहते हैं। अगर उन्हें कभी नगर / बाजार में आना होता है, तो उनके लिए आवश्यक है कि लकड़ी बजा-बजाकर अपने आने की सूचना दें । इसे “ अछूत प्रथा “ भी कहा जा सकता है जो उनके अपवित्र गंदे रहन-सहन के कारण प्रचलित हुई होगी ।

 फाह्यान ने एक ऐसी चीज़ का उल्लेख विस्मयपूर्वक किया है जो उस समय विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं मिलती, और वह थी विपन्न लोगों के लिए धर्मार्थ चिकित्सालय एवं पशु – पक्षियों के लिए चिकित्सालय । भारत में धनी लोगों ने विभिन्न नगरों में “ धर्मार्थ चिकित्सालय “ स्थापित किए थे जहाँ जरूरतमंदों की चिकित्सा तो निःशुल्क होती ही थी, भोजन भी दिया जाता था । उस समय विश्व में कहीं भी धर्मार्थ चिकित्सालय / पशु चिकित्सालय नहीं थे । वस्तुतः यह संकल्पना तो अगले 500 वर्ष तक भी विश्व में कहीं नहीं पनप पाई । अतः कहा जा सकता है कि अन्य अनेक चीज़ों की तरह धर्मार्थ चिकित्सालय एवं पशु चिकित्सालय भी भारत की विश्व को  मौलिक देन हैं । यात्रियों की सुविधा के लिए मुख्य मार्ग के पास ही धर्मशालाओं की तथा वहां उपलब्ध भोजन और रहने की मुफ्त व्यवस्था की भी फाह्यान ने विशेष चर्चा की है । उसका कहना है कि इस प्रकार के धर्मार्थ कार्य धार्मिक (बौद्ध/ जैन / हिंदू) आधार पर नहीं, मानवीय आधार पर मिल-जुल कर किए जाते थे, अतः ऐसे कार्यों में सभी संप्रदायों के लोग सहायता करते थे ।

 फाह्यान ने मगध की समृद्धि की विशेष चर्चा की है । उसने पाटलिपुत्र में सम्राट अशोक के प्राचीन महल की और “ कपोत विहार “ नामक एक भवन की स्थापत्यकला की भूरि – भूरि प्रशंसा की है । अशोक के महल में भारी – भारी पत्थरों का प्रयोग, पत्थरों पर अति सुन्दर खुदाई और पच्चीकारी देखकर उसने लिखा कि ऐसा भवन बनाना मनुष्य के लिए संभव ही नहीं, यह तो निश्चितरूप से देवताओं ने ही बनाया होगा । कपोत विहार में उसने पांच मंजिलें बताई हैं जिनमें पहली मंजिल का आकार हाथी जैसा, दूसरी का सिंह जैसा, तीसरी का घोड़े जैसा, चौथी का बैल जैसा और पांचवीं का कपोत (कबूतर) जैसा था । इसमें 1500 भवन थे। सबसे ऊपर एक झरना था जिसका पानी सब मंजिलों में पहुंचता था। उस युग में पांच मंजिले भवन के ऊपर झरने की व्यवस्था – है न आश्चर्य की बात !

 लोग आमतौर पर खुशहाल थे, सहृदय थे, पड़ोसी किसी भी धर्म (हिंदू / बौद्ध / जैन) का अनुयायी हो, उसके साथ सद्भावना रखते थे । चीन में उन दिनों बौद्ध भिक्षुओं को हिकारत की नजर से देखा जाता था, इसलिए उनकी उपेक्षा की जाती थी, और उनका अनादर होता था, पर भारत में उनका सम्मान देखकर फाह्यान ने इच्छा व्यक्त की कि मेरा अगला जन्म बौद्ध के रूप में भारत में हो । यहाँ पूरे देश में कहीं भी आने –जाने या बसने पर कोई रोक नहीं थी (फाह्यान के साथ आया चीनी भिक्षु भी यहाँ बस गया) । टैक्स बहुत कम थे। जो किसान राजकीय भूमि को जोतते थे, उन्हें ही अपनी उपज का एक अंश लगान के रूप में देना होता था । न्याय सर्वसुलभ था । अपराधियों को उनके अपराध के अनुसार दंड दिया जाता था । मृत्युदंड तो किसी को नहीं दिया जाता था, हाँ, कोड़ों की सज़ा दी जाती थी, पर बहुत कम । लगातार राजद्रोह करने वाले अपराधी का दाहिना हाथ काट दिया जाता था ।

 मूर्तिपूजा आज मानों भारत की पहचान बन गई है, पर इसकी शुरुआत कब हुई, इसका व्यवस्थित विवरण नहीं मिलता । विद्वानों का मानना है कि प्राचीन वैदिक काल में इसका प्रचलन नहीं था, इसकी शुरुआत जैन / बौद्ध धर्म में हुई और इन्हीं के अनुकरण पर इसका हिंदुओं में चलन शुरू हुआ ; पर फाह्यान के विवरण से पता चलता है कि बौद्धों में भी इसकी शुरुआत बहुत बाद में हुई । आज बौद्धों के जो मठ, विहार आदि हैं उनमें भगवान बुद्ध की मूर्ति अवश्य होती है, पर फाह्यान को तत्कालीन मठों, विहारों, संघारामों में बुद्ध की कोई मूर्ति नहीं मिली । उसने अफगानिस्तान में 500 बौद्ध विहारों का, मथुरा में 20 मठों और 3000 बौद्ध भिक्षुओं का,  राजगृह – गया – कौशाम्बी – चमन–ताम्रपालि आदि स्थानों पर बौद्धों के संघारामों का उल्लेख किया है पर उसे कहीं भी बुद्ध की मूर्ति नहीं दिखाई दी ; केवल पटना में उसने बुद्ध की एक मूर्ति देखी, वह भी तब जब कि उस दिन वर्ष के दूसरे मास की अष्टमी थी, और उस दिन प्रतिवर्ष  बौद्ध लोग बुद्ध की मूर्ति का जुलूस निकालते थे । उसे हिंदुओं का भी कोई मंदिर नहीं मिला । पुरुषपुर (पेशावर) में उसने भगवान बुद्ध के भिक्षापात्र और चन्दन की लकड़ी से बनी छड़ी देखी, पर उनकी “ पूजा “ होने का उसे कोई प्रमाण नहीं मिला । इससे यह संकेत मिलता है कि बौद्ध धर्म में भी तब तक मूर्तिपूजा का प्रचलन नहीं हुआ था ।

 फाह्यान की यात्रा से भारत और चीन के सांस्कृतिक सम्बन्ध सुदृढ़ हुए । चीनवासियों को भारत के बारे में “ आँखों देखी जानकारी “ मिली, बौद्ध धर्म के मूल ग्रंथों की प्रामाणिक प्रतियाँ मिलीं, बौद्ध धर्म के प्रति उनकी आस्था और मजबूत हुई । इतना ही नहीं, चीन संस्कृत भाषा के अध्ययन का भी एक प्रमुख केन्द्र बन गया, जापान, कोरिया आदि के लोग संस्कृत पढ़ने के लिए चीन जाने लगे । उस युग में जिन भारतीय ग्रंथों का संस्कृत से चीनी भाषा में अनुवाद किया गया उनकी संख्या लगभग 5,400 बताई जाती है ।

अल-बरूनी (973–1048 ई.) 

अरब से सुलेमान सौदागर, इब्न हौकल, मसऊदी, बुशारी आदि अनेक यात्री भारत आए, और  उन्होंने अपने लिखे विवरण भी छोड़े, पर विवरण की व्यापकता और गहनता की दृष्टि से अल-बिरूनी अद्वितीय है । उसका जन्म ख्वारिज्म (खीवा; वर्तमान उज़बेकिस्तान) में हुआ था । उसका असली नाम तो था अबू रेहान मुहम्मद इब्न-ए-अहमद, पर जो नाम प्रसिद्ध हुआ वह है अल-बरूनी जिसका फारसी में अर्थ होता है “ बाहरी ” । यह नाम क्यों पड़ा, इस सम्बन्ध में कुछ लोग कहते हैं कि उसके माता-पिता ईरानी मूल के थे, अतः उन्हें वहां परदेसी माना जाता था, तो कुछ लोगों का कहना है कि उसका जन्म नगर में नहीं, बल्कि उपनगरीय क्षेत्र में हुआ इसलिए यह नाम पड़ा ।

अल – बरूनी बहु-भाषाविद था और नई – नई चीजें सीखने में विशेष उत्साही था । फाह्यान के लगभग छह सौ वर्ष बाद वह भारत आया तो था (सन 1025 ई. में सोमनाथ पर आक्रमण करने वाले लुटेरे) मुहम्मद गज़नवी के साथ, पर भारत ने उसे कुछ ऐसा आकर्षित किया कि वह अनेक वर्षों तक यहीं रुका रहा । यहाँ उसने संस्कृत का अध्ययन किया, भारतीय ग्रंथों का अध्ययन किया, अनेक विद्याएं सीखीं, और संस्कृत, अरबी एवं फ़ारसी में अनेक पुस्तकें लिखीं । उसने खगोलवेत्ता ब्रह्मगुप्त एवं वराहमिहिर की पुस्तकों का, तथा महर्षि कपिल के सांख्य दर्शन और महर्षि पतंजलि के योगदर्शन का अरबी में अनुवाद किया,  पर उसकी अधिकांश पुस्तकें सुरक्षित नहीं रह सकीं । आजकल उसकी फारसी में लिखी केवल दो प्रमुख पुस्तकों (“आसार – उल- बाकिया “ और “ किताब – उल- हिंद “) के ही मुद्रित संस्करण और अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध हैं । जिस पुस्तक में भारत संबंधी विवरण दिया है उसका पूरा नाम है, “ किताब फ़ी तहक़ीक़ मा लिल हिंद मिन मक़ाला मक़्बूला फ़िल अक़्ल- औ- मरजूला “, इसे ही संक्षेप में किताब-उल-हिंद कहते हैं । डा. एडवर्ड सी. सखाउ के अंग्रेजी अनुवाद के संक्षिप्त संस्करण का हिंदी में अनुवाद भी कयामुद्दीन द्वारा संपादित और नूर नबी अब्बासी द्वारा अनुवादित  “ भारत : अल-बिरूनी ” (नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली, 1992) उपलब्ध है ।

इस पुस्तक में 80 अध्याय हैं जिनका विभाजन विषयवार किया गया हैं। इसमें लेखक ने धर्म और दर्शन, समाज संगठन और धार्मिक नियम, धार्मिक और वैज्ञानिक साहित्य, मूर्तिकला और मूर्तिपूजा, वज़न और माप, कीमिया, भूगोल, विश्व रचना, खगोलशास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, सामाजिक जीवन, रीति-रिवाज, त्यौहार आदि का वर्णन किया है । उसने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि भारतीय हमसे हर बात में भिन्न हैं, फिर चाहे वह भाषा हो, धर्म हो, आचार-व्यवहार हो, वेश-भूषा हो, या रीति-रिवाज हो। अतः उसने एक जिज्ञासु की भाँति हर चीज को समझने का प्रयास किया । कतिपय प्रसंगों में, विशेष रूप से जातिप्रथा, नागर तथा धार्मिक नियमों, मूर्तिकला, मूर्तिपूजा आदि में अल-बिरूनी की समाजशास्त्रीय अंतर्दृष्टि के विशेष दर्शन होते हैं । अनेक स्थानों पर हिंदुओं – यहूदियों – ईसाइयों – मुसलमानों के दार्शनिक विचारों एवं सामाजिक परम्पराओं का तुलनात्मक रूप में भी उल्लेख किया है । उदाहरण के लिए, ईश्वर के स्वरूप के बारे में विचार, विवाह संबंधी परम्पराएं आदि ।

उसने प्राचीन भारतीयों की जिज्ञासा वृत्ति और ज्ञान – विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धियों की बहुत प्रशंसा की है । जैसे, गणित के सम्बन्ध में उसने लिखा, “ किसी भी देश की संख्या हजार से आगे नहीं जाती……जिनके यहाँ हजार से अधिक की गिनती है वे हिंदू हैं …… वे अपने अंकों के घातों के नाम 18 वें घात तक ले जाते हैं। ” इससे आगे भी “ अठारहवें घात के बाद के घातों के नाम वैयाकरणों ने जोड़े हैं (भारत : अल-बिरूनी, पृ. 87-88) “ ; पर यह सब पुराने युग की बात है, अब तो लोगों के मन अभिमान से भरे थे, उनमें अब कोई ज्ञान पिपासा नहीं, न वे किसी और को ज्ञानवान मानने को तैयार थे । इसीलिए उसने लिखा कि वर्तमान युग ज्ञान -विज्ञान की खोजों के लिए उपयुक्त नहीं क्योंकि न तो राजाओं का संरक्षण उपलब्ध है और न जनता का रुझान विज्ञान की ओर है । इस समय जो कुछ है वह “ बीते हुए अच्छे युग के अल्प अवशेष मात्र हैं । ”

भारतीयों के विचारों में संकीर्णता आने लगी थी । विचारों को तर्क की कसौटी पर परखना लगभग बंद हो गया था । रूढिवादिता बढ़ती जा रही थी । छुआछूत की भावना का विस्तार इस सीमा तक हो गया था कि अगर किसी विदेशी से हमारा वस्त्र भी छू जाए तो हम “अपवित्र “ हो जाते थे । तरह-तरह के अंधविश्वास पनपने लगे थे । जादू-टोने में विश्वास बढ़ता जा रहा था । अज्ञानी राजाओं में कीमिया का आकर्षण बढ़ता जा रहा था । उन्हें अगर कोई यह सलाह देता था कि कीमिया से सोना बनाने के लिए इतने बालकों का वध करो तो वह राक्षस इस प्रकार का जघन्य अपराध करने में भी संकोच नहीं करता था । इसलिए अल-बिरूनी ने यह इच्छा व्यक्त की है कि कीमिया के इस “ रसायनशास्त्र “ को संसार की ऐसी दूरस्थ सीमा पर जाकर फेंक दिया जाए, जहाँ तक कोई पहुँच ही न सके, तो यह बड़ा भारी पुण्य होगा I

हर धर्म के अनुयायियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने धर्मग्रंथों का पाठ अवश्य करें,  पर अल-बिरूनी को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि हिंदू लोग जिन वेदों को अपने धर्म का मूल स्रोत बताते हैं, उनका अध्ययन करने से अपने अनुयायियों को मना करते हैं । हिंदू धर्माचार्यों ने वेदों का अध्ययन पहले तो सभी स्त्रियों के लिए प्रतिबंधित किया, और फिर पुरुषों में भी वैश्यों एवं  शूद्रों के लिए वर्जित कर दिया, क्षत्रिय को वेद पढ़ने का अधिकार तो दिया, पर पढ़ाने का नहीं दिया । अतः वेदों पर हिंदुओं के एक विशेष वर्ग अर्थात ब्राह्मणों का एकाधिकार हो गया । इसी का दुष्परिणाम था कि अधिकांश ब्राह्मण वेद का पाठ बिना समझे करते थे । ऐसे लोग बहुत थोड़े से थे जो  वेदों की टीकाएं भी पढ़ते हों, और ऐसे तो विरले ही लोग थे जो वेद पर कोई चर्चा कर सकें । हिंदुओं की प्रचलित धारणा यह थी कि वेद और धर्म के सारे संस्कारों का द्वापर युग में लोप हो गया और उनका स्थान अब पुराणों ने ले लिया है । अठारह पुराणों की चर्चा होने लगी थी,  पर अल-बिरूनी को देखने को मत्स्य, आदित्य और वायु पुराण के ही कुछ अंश मिले । धर्म के क्षेत्र में भी उच्च वर्ग और निम्न वर्ग के विश्वासों में अंतर आने लगा था । इसी का एक प्रमाण था मूर्तिपूजा जिसका प्रचलन समाज के निचले स्तर के अनपढ़ – अज्ञानी लोगों में ही था, ” ….मूर्तियां केवल निम्नवर्ग के अशिक्षित लोगों के लिए स्थापित की जाती थीं जिनको अधिक समझ नहीं है । 

बाल विवाह होने लगा था, विधवा विवाह वर्जित था । सती प्रथा प्रचलित हो चुकी थी, पर अनिवार्य नहीं थी । अंतरजातीय  विवाह होते तो थे, पर प्रायः वैश्यों और शूद्रों में ही मिलते थे । बहु-पत्नी प्रथा थी और उसका स्वरूप यह था कि ब्राह्मण चार, क्षत्रिय तीन, वैश्य दो और शूद्र एक पत्नी रख सकता था । जातिप्रथा जन्मना ही थी, पर आजकल से इस अर्थ में भिन्न थी कि अंतरजातीय विवाह की स्थिति में बच्चा अपनी माँ की जाति का माना जाता था, पिता की जाति का नहीं अर्थात यदि किसी ब्राहमण की पत्नी शूद्र है तो बच्चा शूद्र माना जाएगा, ब्राहमण नहीं । व्यवसाय भी जातिप्रथा के साथ रूढ़ हो गया था । इसलिए विभिन्न जातियों के लोग अपने बाप-दादाओं के व्यवसाय को ही अपनाते थे ।

विवाद निबटाने के लिए लोग क़ानून के बजाय शपथ के द्वारा या कठिन परीक्षाओं के द्वारा झगड़ों  का निबटारा कर लेते थे । अपराधों के लिए कठोर दंड की व्यवस्था थी। चोरी का दंड चुराई हुई वस्तु के मूल्य के अनुरूप होता था जो हाथ-पैर काटकर विकलांग करने, अंधा करने  आदि से लेकर वध करने तक कुछ भी हो सकता था ।

इतिहास के लाभ :

विदेशी यात्रियों के ये विवरण अब इतिहास की धरोहर हैं । इतिहास हमारा अतीत होता है । उसके अध्ययन से हमें जहाँ एक ओर अपने पूर्वजों की उन उपलब्धियों का पता चलता है जिनके कारण हमारा सिर आज भी गर्व से ऊंचा हो जाता है, वहीँ दूसरी ओर उन कमजोरियों का भी पता चलता है जो हमारे पराभव का कारण बनीं । इस प्रकार इतिहास का अध्ययन हमें अपने वर्तमान को सुधारने और भविष्य को संवारने की प्रेरणा देता है ।

 —डॉ रवींद्र अग्निहोत्री

COMMENTS

BLOGGER

POPULAR POSTS$type=three$author=hide$comment=hide$rm=hide

TOP POSTS (30 DAYS)$type=three$author=hide$comment=hide$rm=hide

Name

about us,2,AKTU,1,BANK EXAM,1,Best Gazzal,1,bhagwat darshan,3,bhagwatdarshan,2,birthday song,1,BPSC,2,CBSE,2,computer,40,Computer Science,41,contact us,1,COURSES,1,CPD,1,darshan,16,Download,4,DRDO,1,EXAM,1,Financial education,2,Gadgets,1,GATE,1,General Knowledge,34,JEE MAINS,1,Learn Sanskrit,3,medical Science,1,Motivational speach,1,PAPER I,14,POINT I,5,POINT II,3,POINT III,2,POINT IV,2,POINT V,2,poojan samagri,4,Privacy policy,1,psychology,1,RECRUITMENT,9,Research techniques,41,RESULT,2,RPSC,1,RSMSSB,1,Science,1,solved question paper,3,sooraj krishna shastri,6,Sooraj krishna Shastri's Videos,60,SPORTS,4,SSC,1,SYLLABUS,1,TGT,1,UGC NET/JRF,16,UKPSC,1,UNIT I,13,UNIT II,1,University,1,UP PGT,1,UPSC,2,World News,1,अध्यात्म,203,अनुसन्धान,26,अन्तर्राष्ट्रीय दिवस,10,अभिज्ञान-शाकुन्तलम्,5,अष्टाध्यायी,1,आओ भागवत सीखें,16,आज का समाचार,46,आधुनिक विज्ञान,22,आधुनिक समाज,153,आयुर्वेद,49,आरती,8,ईशावास्योपनिषद्,21,उत्तररामचरितम्,35,उपनिषद्,34,उपन्यासकार,1,ऋग्वेद,16,ऐतिहासिक कहानियां,4,ऐतिहासिक घटनाएं,16,कथा,12,कबीर दास के दोहे,1,करवा चौथ,1,कर्मकाण्ड,123,कादंबरी श्लोक वाचन,1,कादम्बरी,2,काव्य प्रकाश,1,काव्यशास्त्र,32,किरातार्जुनीयम्,3,कृष्ण लीला,2,केनोपनिषद्,10,क्रिसमस डेः इतिहास और परम्परा,9,खगोल विज्ञान,3,गजेन्द्र मोक्ष,1,गीता रहस्य,2,ग्रन्थ संग्रह,1,चाणक्य नीति,2,चार्वाक दर्शन,4,चालीसा,6,जन्मदिन,1,जन्मदिन गीत,1,जयंती,1,जयन्ती,4,जीमूतवाहन,1,जैन दर्शन,3,जोक,6,जोक्स संग्रह,5,ज्योतिष,52,तन्त्र साधना,2,दर्शन,36,देवी देवताओं के सहस्रनाम,1,देवी रहस्य,1,धर्मान्तरण,5,धार्मिक स्थल,50,नवग्रह शान्ति,3,नीतिशतक,27,नीतिशतक के श्लोक हिन्दी अनुवाद सहित,7,नीतिशतक संस्कृत पाठ,7,न्याय दर्शन,18,परमहंस वन्दना,3,परमहंस स्वामी,2,पारिभाषिक शब्दावली,1,पाश्चात्य विद्वान,1,पुराण,1,पूजन सामग्री,7,पूजा विधि,2,पौराणिक कथाएँ,74,प्रत्यभिज्ञा दर्शन,1,प्रश्नोत्तरी,41,प्राचीन भारतीय विद्वान्,100,बर्थडे विशेज,5,बाणभट्ट,1,बौद्ध दर्शन,1,भगवान के अवतार,4,भजन कीर्तन,39,भर्तृहरि,18,भविष्य में होने वाले परिवर्तन,12,भागवत,4,भागवत : गहन अनुसंधान,30,भागवत अष्टम स्कन्ध,28,भागवत अष्टम स्कन्ध(हिन्दी),1,भागवत एकादश स्कन्ध,31,भागवत एकादश स्कन्ध(हिन्दी),1,भागवत कथा,136,भागवत कथा में गाए जाने वाले गीत और भजन,7,भागवत की स्तुतियाँ,4,भागवत के पांच प्रमुख गीत,6,भागवत के श्लोकों का छन्दों में रूपांतरण,1,भागवत चतुर्थ स्कन्ध,31,भागवत चतुर्थ स्कन्ध(हिन्दी),1,भागवत तृतीय स्कंध(हिन्दी),13,भागवत तृतीय स्कन्ध,33,भागवत दशम स्कन्ध,91,भागवत दशम स्कन्ध(हिन्दी),1,भागवत द्वादश स्कन्ध,13,भागवत द्वादश स्कन्ध(हिन्दी),1,भागवत द्वितीय स्कन्ध,10,भागवत द्वितीय स्कन्ध(हिन्दी),10,भागवत नवम स्कन्ध,38,भागवत नवम स्कन्ध(हिन्दी),1,भागवत पञ्चम स्कन्ध,26,भागवत पञ्चम स्कन्ध(हिन्दी),1,भागवत पाठ,58,भागवत प्रथम स्कन्ध,22,भागवत प्रथम स्कन्ध(हिन्दी),19,भागवत महात्म्य,3,भागवत माहात्म्य,18,भागवत माहात्म्य स्कन्द पुराण(संस्कृत),2,भागवत माहात्म्य स्कन्द पुराण(हिन्दी),2,भागवत माहात्म्य(संस्कृत),2,भागवत माहात्म्य(हिन्दी),9,भागवत मूल श्लोक वाचन,55,भागवत रहस्य,56,भागवत श्लोक,7,भागवत षष्टम स्कन्ध,19,भागवत षष्ठ स्कन्ध(हिन्दी),1,भागवत सप्तम स्कन्ध,15,भागवत सप्तम स्कन्ध(हिन्दी),1,भागवत साप्ताहिक कथा,9,भागवत सार,35,भारतीय अर्थव्यवस्था,15,भारतीय इतिहास,22,भारतीय उत्सव,3,भारतीय दर्शन,5,भारतीय देवी-देवता,8,भारतीय नारियां,3,भारतीय पर्व,56,भारतीय योग,3,भारतीय विज्ञान,38,भारतीय वैज्ञानिक,2,भारतीय संगीत,2,भारतीय सम्राट,3,भारतीय संविधान,1,भारतीय संस्कृति,4,भाषा विज्ञान,16,मनोविज्ञान,4,मन्त्र-पाठ,8,मन्दिरों का परिचय,1,महा-शिव-रात्रि व्रत,6,महाकुम्भ 2025,7,महापुरुष,46,महाभारत रहस्य,35,महीसुर -महिमा -माला,4,मार्कण्डेय पुराण,1,मुक्तक काव्य,19,यजुर्वेद,3,युगल गीत,1,योग दर्शन,1,रघुवंश-महाकाव्यम्,5,राघवयादवीयम्,1,रामचरितमानस,5,रामचरितमानस की विशिष्ट चौपाइयों का विश्लेषण,130,रामायण के चित्र,19,रामायण रहस्य,66,राष्ट्रीय दिवस,6,राष्ट्रीयगीत,1,रील्स,7,रुद्राभिषेक,1,रोचक कहानियाँ,159,लघुकथा,38,लेख,184,वास्तु शास्त्र,14,वीरसावरकर,1,वेद,3,वेदान्त दर्शन,9,वैदिक कथाएँ,38,वैदिक गणित,2,वैदिक विज्ञान,2,वैदिक संवाद,23,वैदिक संस्कृति,33,वैशेषिक दर्शन,13,वैश्विक पर्व,10,व्रत एवं उपवास,41,शायरी संग्रह,4,शिक्षाप्रद कहानियाँ,130,शिव रहस्य,3,शिव रहस्य.,5,शिवमहापुराण,15,शिशुपालवधम्,2,शुभकामना संदेश,7,श्राद्ध,1,श्रीमद्भगवद्गीता,23,श्रीमद्भागवत महापुराण,17,सनातन धर्म,4,सरकारी नौकरी,11,सरस्वती वन्दना,1,संस्कृत,11,संस्कृत काव्य पाठ,1,संस्कृत गीतानि,37,संस्कृत बोलना सीखें,13,संस्कृत में अवसर और सम्भावनाएँ,6,संस्कृत व्याकरण,26,संस्कृत श्लोक,22,संस्कृत साहित्य,13,संस्कृत: एक वैज्ञानिक भाषा,1,संस्कृत:वर्तमान और भविष्य,6,संस्कृतलेखः,2,सांख्य दर्शन,6,साहित्यदर्पण,23,सुभाषितानि,30,सुविचार,27,सूरज कृष्ण शास्त्री,456,सूरदास,1,स्तोत्र पाठ,62,स्वास्थ्य और देखभाल,8,हमारी प्राचीन धरोहर,1,हमारी विरासत,7,हमारी संस्कृति,105,हँसना मना है,6,हिन्दी रचना,34,हिन्दी साहित्य,5,हिन्दू तीर्थ,3,हिन्दू धर्म,4,होली पर्व,3,
ltr
item
भागवत दर्शन: भारतीय इतिहास: विदेशी यात्रियों की नजर में भारत
भारतीय इतिहास: विदेशी यात्रियों की नजर में भारत
भारतीय इतिहास: विदेशी यात्रियों की नजर में भारत, मेगस्थनीज (350 – 290 ई. पू.),फाह्यान (337 – 422 ई.),अल-बरूनी (973–1048 ई.),इतिहास के लाभ, भागवत दर्शन
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgYf_vHCszJ_Lcty1Y5xRjmFefLDscOn8B_I8TIt13CuyXbpZpHKzEK2QufhNg-iE3ZBa3r4LC_-as8FIEEuZJ1PUO6kyAg8sBYlcPSq1B2CO6Z2BsY5W3tNz2TwtGiXAjEBLexYH9br0OaD5_0tCm8Z1cIZ2MBkVlaoob6UGAQOqnJLJ4NZxjOj10nNFw/s16000/InShot_20250313_143148236.jpg
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgYf_vHCszJ_Lcty1Y5xRjmFefLDscOn8B_I8TIt13CuyXbpZpHKzEK2QufhNg-iE3ZBa3r4LC_-as8FIEEuZJ1PUO6kyAg8sBYlcPSq1B2CO6Z2BsY5W3tNz2TwtGiXAjEBLexYH9br0OaD5_0tCm8Z1cIZ2MBkVlaoob6UGAQOqnJLJ4NZxjOj10nNFw/s72-c/InShot_20250313_143148236.jpg
भागवत दर्शन
https://www.bhagwatdarshan.com/2025/03/blog-post_47.html
https://www.bhagwatdarshan.com/
https://www.bhagwatdarshan.com/
https://www.bhagwatdarshan.com/2025/03/blog-post_47.html
true
1742123354984581855
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content