राम प्रेम बिनु डूबरो राम प्रेमहिं पीन। रघुबर कहुँक करहुगे तुलसिहि ज्यों जल मीन॥, भागवत दर्शन सूरज कृष्ण शास्त्री, रामचरितमानस की विशिष्ट चौपाइयो
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राम प्रेम बिनु डूबरो राम प्रेमहिं पीन। रघुबर कहुँक करहुगे तुलसिहि ज्यों जल मीन॥ |
राम प्रेम बिनु डूबरो राम प्रेमहिं पीन। रघुबर कहुँक करहुगे तुलसिहि ज्यों जल मीन॥
राम प्रेम बिनु डूबरो राम प्रेमहिं पीन।
रघुबर कहुँक करहुगे तुलसिहि ज्यों जल मीन॥
कैसी भक्ति होनी चाहिए यह गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा प्रभु से की गई प्रार्थना से स्पष्ट होता है।
"जैसे मछली जल के संयोग से पुष्ट होती है और जल के बिना दुबली हो जाती है, जल के वियोग में मर जाती है, वैसे ही है श्री रघुनाथ जी! आप इस तुलसीदास को कब ऐसा करेंगे जब वह श्री राम के प्रेम के बिना मछली की भाँति दुबला जाए और श्री राम (आप) के प्रेम से ही पुष्ट हो!"
इष्ट से निरंतर प्रेमभाव है, जैसे परमभक्त गोस्वामी तुलसीदास जी निरंतर प्रिय रूप की विनती करते हैं उनका भक्ति प्रेम सदा दास्य-भाव से भली-भाँति स्थापित है।
या प्रीतिरविवेकानां विषयेश्वनपायिनी।
त्वामनुस्मरतः सा मे हृद्यान्माऽपसर्पतु ॥
हे प्रभु, अविवेकी बेटों की जैसी गढ़ी प्रीति विषयों में रहती है (जैसे कामी पुरुष की प्रीति स्त्री में, लोभी पुरुष का धन में), उसी प्रकार की प्रीति मेरी आप में हो और आपका स्मरण करते हुए मेरे दिल से आप कभी दूर न हों।
"पद्म पुराण" में गोस्वामी जी जैसी प्रार्थना करते हैं उसका स्वरूप भी यही है।
त्वं हेतुः सर्वभूतानां त्वमेव शरणं मम ।
युवतीनां यथा यूनि यूनां च युवतौ यथा।।
मेरा प्रेम आपमें उसी प्रकार रमण करे, जैसे युवतियाँ युवकों में रमण करती हैं और युवक युवतियों में रमण करते हैं। वैसे ही हे प्रभु! मेरा मन भी आप में सदा रमता रहे।
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥
जैसी कामी को स्त्री प्रिय लगती है और लोभी को जैसी धन प्यारी लगती है, वैसे ही हे रघुनाथजी। हे रामजी! आप निरंतर मुझे प्रिय लगिए॥
एक वृक्ष की जड़ से लेकर हर शाखा में रस होता है, लेकिन जड़, शाखा या पत्ते खाने से वह रस नहीं मिलेगा जो फल खाने से मिलता है। दूध में घी होता है, लेकिन दूध पीने से घी का स्वाद नहीं आता। ईख में खाँड होती है, लेकिन जब तक ईख को तोड़ा नहीं जाता, उसका स्वाद नहीं मिलता। भागवत कथा एवं संत-समागम भी इसी तरह है।
भाग्योदयेन बहुजन्मसमर्जितेन
सत्सङ्गमं च लभते पुरुषो यदा वै ।
अज्ञानहेतुकृतमोहमदान्धकार-
नाशं विधाय हि तदोदयते विवेकः ।।
जब अनेकों जन्मों के संचित पुण्यपुंज का उदय होने से मनुष्य को सत्संग मिलता है, तब वह उसके अज्ञान-जनित मोह और मदरूप अन्धकारका नाश करके विवेक उदय होता है ।
जब आप उस भक्ति में डूब जाओगे , तब तुम्हें पता चलेगा कि उस भक्ति में क्या खिंचाव है, क्या धारा है। और जब तुम डूबते हो, तो यह मत सोचो कि तुम तैर सकते हो या नहीं। अपने आप को उसमें डूब जाने दो। भक्ति धारा तुम्हें बहा ले जाएगी।' और जीवन रुपी मकड़जाल से मुक्त हो जाओगे।
गीता में भगवान श्री कृष्ण जी कहते हैं कि —
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यास्य मत्पराः।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नाचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥
लेकिन जो अपने सभी कर्मों को मुझे समर्पित करते हैं और मुझे परम लक्ष्य समझकर मेरी आराधना करते हैं और अनन्य भक्ति भाव से मेरा ध्यान करते हैं, मन को मुझमें स्थिर कर अपनी चेतना को मेरे साथ एकीकृत कर देते हैं। हे पार्थ! मैं उन्हें शीघ्र जन्म-मृत्यु के सागर से पार कर उनका उद्धार करता हूँ।
यदि हम अपनी जीवन रूपी नौका को ईश्वर को सौंप दें तो हमारा उद्धार होकर ही रहेगा, परन्तु उसके लिए पूर्ण रूप से अपने आप को भगवान को समर्पित करना होगा।
भगवान कहते हैं, सबसे सरल कार्य है कि मेरी नाव में बैठ जाओ। जो शीघ्र मुझमें चित्त लगा लें उनको भवसागर से पार करवाना मेरा दायित्व है। जबकि निर्गुण भक्ति वाले स्वयं भवसागर से पार चले जाते हैं।
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशय:।।
आप मुझ में मन को स्थापन कर (और) मुझ में ही बुद्धि को प्रविष्ट कर; इसके बाद (तू) मुझ में ही निवास करेगा (इसमें) संशय नहीं है।
श्रीभगवान जी कहते हैं कि मुझ में मन और बुद्धि को प्रविष्ट कर फिर तू मुझ में ही निवास करेगा इसमें कोई संशय नहीं है। तुम अपनी बुद्धि का निवेश मेरे अन्दर कर दो।
अर्जुन से दो काम करने को कहते हैं - मन को भगवान पर स्थिर करो और बुद्धि को भी भगवान को समर्पित करो। मन का कार्य इच्छाएँ, आकर्षण और द्वेष उत्पन्न करना है। बुद्धि का कार्य सोचना, विश्लेषण करना और विवेक करना है।
वैदिक शास्त्रों में मन के महत्व को बार-बार बताया गया है।
चेतः खल्वस्य बन्धाय मुक्तये चात्मानो मतम्।
गुणेषु सक्तम् बन्धाय रतम् वा पुंसि मुक्तये।।
माया की कैद और उससे मुक्ति मन द्वारा निर्धारित होती है। यदि मन संसार से जुड़ा हुआ है, तो व्यक्ति बंधन में है, और यदि मन संसार से अलग है, तो व्यक्ति मुक्त हो जाता है।
भगवान कहते हैं कि जब तुम अपने मन और बुद्धि से मेरे निमित्त आ जाओगे तो मैं तुम्हारे अन्दर ही निवास करूँगा। मन तो मान लेता है कि ये भगवान हैं, परन्तु बुद्धि प्रश्न करती है कि क्या पत्थर की मूर्ति में भी कभी भगवान होते हैं?
बहुत से लोग मन्दिर के बाहर से ही अपने दोनों गालों पर हाथ लगाकर भगवान से कहते हैं कि हमारे पास अन्दर आने का समय नहीं है भगवान। जब तक मन और बुद्धि को पूरी तरह से भगवान में समर्पित न कर दें तब तक सारी पूजा व्यर्थ है।
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
बंधन और मोक्ष मन की स्थिति से तय होते हैं।
केवल शारीरिक भक्ति पर्याप्त नहीं है; हमें मन को भगवान के चिंतन में लगाना चाहिए। इसका कारण यह है कि मन की व्यस्तता के बिना, केवल इंद्रिय क्रिया का कोई महत्व नहीं है। उदाहरण के लिए, हम अपने कानों से कोई उपदेश सुनते हैं, लेकिन अगर मन भटक जाता है, तो हमें पता नहीं चलेगा कि क्या कहा गया था। शब्द कानों में पड़ेंगे, लेकिन वे दर्ज नहीं होंगे। इससे पता चलता है कि मन को व्यस्त किए बिना इंद्रियों का काम मायने नहीं रखता। दूसरी ओर, मन एक ऐसा यंत्र है जिसमें सभी इंद्रियां सूक्ष्म रूप में रहती हैं। इस प्रकार, वास्तविक इंद्रिय क्रिया के बिना भी मन दृष्टि, गंध, स्वाद, स्पर्श और ध्वनि की धारणाओं का अनुभव करता है। उदाहरण के लिए, रात को जब हम सोते हैं तो हमारी इंद्रियां निष्क्रिय होती हैं। फिर भी सपने देखते समय, हमारा मन सभी इंद्रियों के विषयों का अनुभव करता है। इससे साबित होता है कि मन में स्थूल इंद्रियों के बिना भी सभी धारणाओं का अनुभव करने की क्षमता है। इसलिए हमारे कर्मों पर ध्यान देते हुए भगवान मानसिक कार्यों को महत्व देते हैं, इंद्रियों के भौतिक कार्यों को नहीं।
गीता में ज्ञान और विज्ञान, दोनों साथ-साथ चलते हैं। भगवान स्वयं मार्गदर्शन करने वाले हैं। गीता पढ़ने से ज्ञान की एक-एक पर्त खुलती जाती है। ऐसे लोगों का मोक्ष जीवन कील में भी और मृत्यु के पश्चात भी असंशय हो जाता है। शबरी ने भी तो ऐसी ही भक्ति की थी। शबरी सात-आठ साल की ही थी। उसके पिता कुछ मेमने खरीद कर लाए थे। वह उनके साथ खेलती थी। एक दिन शबरी मेमनों के साथ खेल रही थी तब उसके पिता ने कहा कि खेल ले जब तक खेलना है, जब तेरा विवाह होगा तो यह सब काट के पका दिए जाएँगे। यह सुनकर शबरी रात भर सो नहीं पाई और रात में ही घर से भाग गई। सुबह जब पता चला कि शबरी घर पर नहीं है तो उसको ढूँढने के लिए उसके पिता ने आदमी भेजे। लोगों को आता देखकर शबरी एक पेड़ पर चढ़ गई। दिन भर पेड़ पर रही और रात को दौड़ने लग गई। इस प्रकार वह दिन में तो पेड़ पर चढ़ जाती और रात को दौड़ती। इस प्रकार करते-करते एक दिन वह एक आश्रम के पास पहुँच गई। वहाँ उसने अत्यन्त सात्त्विक ऋषियों को देखा। आश्रम के गुरु मतङ्ग ऋषि ने उसे आश्रम में रहने की अनुमति दे दी। एक दिन ऋषि मतङ्ग ने कह दिया कि आज मेरा जाने का दिन आ गया है, जिसको जो भी प्रश्न पूछने हों वह पूछ ले। सभी शिष्य अपने-अपने प्रश्न पूछने लगे परन्तु शबरी तो बहुत छोटी थी। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं क्या पूछूँ?
जब उसका अवसर आया तो वह बोली आप कहाँ जा रहे हैं?
क्या आप कभी नहीं आएँगे?
मुझे सिर्फ यह बता दीजिए कि भगवान कहाँ मिलेंगे?
क्या वह मुझे कभी मिलेंगे भी या नहीं?
मतङ्ग ऋषि ने कहा, भगवान तुझे मिलने यहीं आएँगे, तू उनकी प्रतीक्षा करती रहना। तब से शबरी भगवान की प्रतीक्षा करने लगी। मतङ्ग ऋषि के स्वर्गवास के बाद सभी शिष्य इधर-उधर चले गए परन्तु शबरी उसी आश्रम में ही रही।
प्रतिदिन भगवान की प्रतीक्षा करती और कहती कि मेरे राम आएँगे। पूरब की दिशा में झाड़ू लगाती। एक दिन उसे समझ आया, क्या पता भगवान पश्चिम से आएँ या दक्षिण से या उत्तर से आ जाएँ और तब से उसने चारों दिशाओं में साफ-सफाई करनी प्रारम्भ कर दी। शबरी प्रतिदिन नदी पर जाती और जल लेकर आती कि मेरे राम आएँगे। वह अपना अस्तित्व ही भूल गई। वह नित्य जल लाती और बेर आदि फल ला कर रखती। उन्हें चख भी लेती कि कहीं कोई फल खराब न हो। इस प्रकार करते-करते शबरी बूढ़ी हो गई परन्तु उसे विश्वास था कि मेरे गुरुजी ने कहा है कि श्रीराम आएँगे, तो वे जरूर आएँगे। नित्य पुष्प ला कर रखती थीं कि मेरे राम आएँगे। वह रात को सोती भी नहीं थी। उसे लगता था कि कहीं ऐसा न हो कि राम रात में आ जाएँ और मैं सोती ही रह जाऊँ। शबरी न तो सोई और न ही उसका विश्वास कम हुआ। यह भक्तियोग का शिखर है। जब श्रीराम आए तो शबरी की आँखों से आँसू बहने लगे, वह जब भगवान के चरण धोने के लिए जल लेने जाने लगी तो श्रीराम ने कहा कि शबरी तेरा काम तो हो गया। तूने अपने आँसुओं से मेरे चरण पहले ही धो दिए हैं। ऐसा सौभाग्य सिर्फ शबरी को मिला।
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥
भगवान ने शबरी को निमित्त बनाकर वहाँ के निवासियों को नवधा भक्ति यथा- श्रवण, कीर्तन, प्रभु-स्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, वन्दन, दास्यभाव, सख्य भाव तथा आत्मनिवेदन के विषय में बताया।
दूसरे शब्दों में नवधा भक्ति इस प्रकार मान लेते हैं —
श्रवण (परीक्षित), कीर्तन (शुकदेव), स्मरण (प्रह्लाद), पादसेवन (लक्ष्मी), अर्चन (पृथुराजा), वंदन (अक्रूर), दास्य (हनुमान), सख्य (अर्जुन) और आत्मनिवेदन (बलि राजा) - इन्हें नवधा भक्ति कहते हैं।
शबरी वहीं समाधिस्थ हो गई तथा भगवान के हाथों से उसका अन्तिम संस्कार हुआ। यह शबरी का विश्वास था, पूरे जीवन का श्रम था। उसने भगवान के अतिरिक्त पूरे जीवन कुछ और सोचा ही नहीं। केवल मन ही नहीं, बुद्धि भी पूरी तरह झुक गई थी।
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छप्तुं धनञ्जय।।
अगर (तू) मन को मुझ में अचल भाव से स्थिर (अर्पण) करने में अपने को समर्थ नहीं मानता, तो हे धनञ्जय ! अभ्यास योग के द्वारा (तू) मेरी प्राप्ति की इच्छा कर।
श्रीभगवान जी कहते हैं कि अगर तू मन को मुझ में अचल भाव से स्थिर करने में अपने को समर्थ नहीं मानता, तो हे धनञ्जय! अभ्यास योग के द्वारा तू मेरी प्राप्ति की इच्छा कर।
अभ्यास अर्थात् पढ़ना नहीं, अपितु अभ्यास का अर्थ है चेष्टा करना, प्रयास करना, इसलिए हे धनञ्जय! तू पहले मेरी इच्छा तो कर। यदि मुझे प्राप्त करना है, तो मुझे प्राप्त करने की इच्छा कर। प्राप्त करने की इच्छा का अभ्यास कर और यदि यह भी नहीं कर सकता है तो फिर आगे सुन।
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि, मत्कर्मपरमो भव।
मदर्थमपि कर्माणि, कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि।।
(अगर तू) अभ्यास (योग) में भी (अपने को) असमर्थ (पाता) है, (तो) मेरे लिये कर्म करने के परायण हो जा। मेरे लिये कर्मों को करता हुआ भी (तू) सिद्धि को प्राप्त हो जायगा।
श्रीभगवान जी कहते हैं कि यदि अभ्यास करने में भी असमर्थ हो तो जो भी काम करो, वह मेरा समझ कर करना आरम्भ करो। स्नान करते समय, भोजन पकाते समय, कार्य पर जाते समय अर्थात कोई भी कार्य करते समय वे सारे कार्य मुझे अर्पित करो। ऐसा करने वाले व्यक्ति को सिद्धि प्राप्त हो जाती है। यह अर्पण भाव दिन भर चलना चाहिए।किसी से बात भी कर रहे हो तो सोचो कि मुझसे बात कर रहे हो। फिर गलत बात निकलेगी ही नहीं।
जीवों का कलरव जो दिन भर सुनने में मेरे आवे।
तेरा ही गुणगान जान मन प्रमुदित हो अति सुख पावे।।
तेरा ही गुणगान चल रहा है, ऐसा सोच कर हर बात करना। चलते हो तो प्रदक्षिणा समझ लेना, भोजन करो तो वह भोग समझ लो, सोते हो तो समाधि समझ लेना। यही भक्ति है।
आदि शङ्करचार्य जी ने कहा:-
आत्मा त्वं गिरिजा मति: सहचरा: प्राणा: शरीरं गृहम्
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थिति:।
संचार: पदयो: प्रदक्षिणविधि: स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत् कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्।।
आप आत्मा हैं,मति पार्वती है,प्राण आपके गण हैं,शरीर मन्दिर है।जो खाना-पीना है,वह आपकी पूजा है।निद्रा समाधि है।चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है।जो शब्द बोल रहा हूं,वे स्तोत्र-पाठ हैं।जो कुछ भी कर रहा हूं,हे शिव आपकी आराधना के अतिरिक्त और हो भी क्या सकता है क्योंकि आप सर्व हैं न,
जब सब कुछ आप ही हैं,
सर्वं शिवमयं जगत।
देहु भगति रघुपति अति पवित्र।
त्रिबिधि ताप भव दाप नसावनि॥
प्रणत काम सुरधेनु कल्पतरु।
होइ आकर्षक दीजै प्रभु ये बरु॥
हे रघुनाथजी, आप हमें अपनी अत्यंत पवित्र करने वाली और तीर्थों के तापों और जन्म-मरण के क्लेशों का नाश करने वाली प्रेमा-भक्ति देते हैं।
हे शरणागतों की कामना पूर्ण करने के लिए कामधेनु और कल्पवृक्ष रूप प्रभो! पसंदीदा हमें यही वर दें॥
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