वैदिक ऋषि: बृहस्पति ऋषि, वैदिक ऋषि,वैदिक संस्कृति,भागवत दर्शन सूरज कृष्ण शास्त्री। कोई उसे देखता है, किन्तु नहीं देख पाता।कोई उसे सुनता है,पर नही।
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वैदिक ऋषि: बृहस्पति ऋषि |
वैदिक ऋषि: बृहस्पति ऋषि
बृहस्पति ऐसे सर्वमान्य ऋषि हैं, जिन्होंने शब्द को सर्वोच्च प्रतिष्ठा दी। बृहस्पति की एक बहुत ही सुंदर कविता ऋग्वेद के दशम मंडल (ऋग्वेद:१०:७१) में मिलती है। यह सूक्त प्रायः बृहस्पति सूक्त या ज्ञान सूक्त के नाम से जाना जाता है। यहाँ पहली बार शब्द के स्वरूप और अर्थविज्ञान को लेकर व्यापक विमर्श हुआ, और ज्ञान की महिमा को विस्तार भी मिला। सूक्त की काव्यात्मक उपमाओं ने आगे लम्बी यात्रा पूरी की। ऐसा भी माना जाता है पवित्र और सार्थक वाणी के महत्व को प्रतिपादित करते हुए इस सूक्त ने शब्दशास्त्र की नींव रखी। वेदवाणी में गुम्फित ऋत और सत्य के संधान का मार्ग प्रशस्त करता हुआ यह सूक्त रोचक भी है, और बहुत ही विचारोत्तेजक भी।
यह सूक्त ऋग्वेद की प्रचलित स्तुति-परम्परा से भिन्न है। बृहस्पति के अनुसार सबसे पहले शब्द की ही उत्पत्ति हुई। बृहस्पति शब्द को ही नाम कहते हैं, उसे ही परिभाषित धर्म कहते हैं। वह श्रेष्ठ और सर्वथा दोषमुक्त शब्द ही है, जो हृदय की गुहा के भीतर छुपा हुआ था, और वेदवाणी के रूप में प्रकट हुआ। बृहस्पति इस सूक्त में निहित कविता में कहते हैं-'चलनी से छने हुए सत्तू की तरह मन में छन कर स्वच्छ होते हैं शब्द। जो सत्य के सखा हैं, वे भली भाँति जानते हैं कि
पवित्र वाणी में लक्ष्मी बसती है। 'भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधि वाचि।' (ऋग्वेद: १०:७१:२)', यह बृहस्पति का ऐसा सूत्र-वाक्य है, जिससे पवित्र वेदवाणी की महिमा द्विगुणित हो जाती है।
बृहस्पति हमारी कई जिज्ञासाओं को शान्त करते हैं। वे हमारे कई गूढ़ प्रश्नों को सुलझाने हुए कहते हैं कि प्राचीन ऋषियों ने यज्ञ करते हुए वेदवाणी को खोजा, वह अंततः ऋषियों के उस हृदय में ही मिली, जहाँ से निकल कर वह सप्त छंदों में मुखरित हुई। यहाँ बृहस्पति की कविता का प्रवाह अद्भुत है-
'कोई उसे देखता है,
किन्तु नहीं देख पाता।
कोई उसे सुनता है,
पर नहीं सुन पाता।
किसी के सम्मुख खुल जाती वह
जैसे पति के सम्मुख अनावृत होती कामिनी।
जो कर चुके ज्ञानामृत का पान,
वे होते नहीं पराभूत विद्वत्सभा में।
शेष तो सुनते रहते
पुष्पहीन निष्फल वाणी को
और भटकते फिरते
दुग्धहीन धेनु के पीछे।
आँखें सबकी हैं, कान सबके हैं,
सब देखते हैं, सब सुनते हैं,
किन्तु ज्ञान-सरोवर में
कुछ मुँह तक पानी में खड़े,
कुछ कटिप्रदेश तक।
कुछ ही हैं जो डूब कर नहा रहे।'
(ऋग्वेद:१०:७१:४,५,७)
यह है बृहस्पति की कविता। ऋग्वेद के पृष्ठों पर इस तरह की कविता को उतरते देख कर आश्चर्य होता है। ऐसा लगता है, बृहस्पति सबकी क्लास ले रहे हैं, परीक्षा भी ले रहे हैं और उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण की घोषणा भी कर रहे हैं। एक जगह वे लगभग ललकारते हुए दिखाई दे रहे हैं-'तुमने सच्चे साथी को छोड़ दिया। अबतुम्हारी वाणी में सत्य का अंशमात्र नहीं। जो कुछ सुनते हो वह सब अनृत। तुम नहीं जानते मंगलमय पथ वह है कहाँ? सहृदय और मनस्वी चल पड़ते हैं सत्य की खोज में। मंदमति छूट जाते हैं बहुत पीछे। आगे निकलते हुए मेधावी पहुँच ही जाते अपने बिन्दु पर। ज्ञान की महिमा को जो नहीं जानते, वे जीत नहीं पाते इस संसार को, न उस सत्य को, जो व्याप्त है शून्य से शिखर तक। वे फैलाते रहते हैं शब्दजाल, जैसे धागों का जाल फैलाती बुनकर औरतें।'
बृहस्पति की यह कविता आज भी हमारी आँखें खोलने के लिये सजग दिखाई देती है। यह कविता हमें वैदिक कर्मकांड के संजाल में घुसने ही नहीं देती, अपितु वेदों के निहितार्थ को जानने के लिये उच्चतर चेतना वाले मेधावियों की शरण में जाने का मार्ग भी दिखाती है। यह कविता ऋग्वेद में एकमात्र है, जो हममें उग आये मिथ्या अभिमान को छिन्न-भिन्न कर देती है। यहाँ बृहस्पति की यह सार्वकालिक कविता अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए इस बात के लिये भी सचेत करती है के प्रयोग में लाने से पहले शब्द की पवित्रता सुनिश्चित् हो। ऐसा प्रतीत होता है, कि अत्यंत प्राचीनकाल में बृहस्पति का यह सूक्त यज्ञ-संस्थाओं और स्वाध्याय की शाखाओं में विधिपूर्वक दोहराया जाता होगा, और इसके अनुशीलन का भी नियम रहा होगा।
ये एक मात्र ऋषि हैं, जो अपने जीवनकाल में ही ज्ञान के देवता की तरह पूजे गये। इन्हें इन्द्र, पूषा आदि देवों के समकक्ष रखा जाने लगा। ऋग्वेद में कई जगह बृहस्पति से रक्षा की प्रार्थना की गई है। 'स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु' जैसी प्रार्थना की अनेक पंक्तियाँ इस बात का प्रमाण है कि ऋषियों में बृहस्पति का स्थान सबसे ऊँचा है।
आज हमें वेद जिस अनुशासन में मिलते हैं, उसका श्रेय बृहस्पति को भी है।
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