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भागवत कथा: कृष्ण और उद्धव का संवाद |
भागवत कथा: कृष्ण और उद्धव का संवाद
श्रीमद्भागवत महापुराण के ग्यारहवें स्कंध (अध्याय 6-29) में भगवान श्रीकृष्ण और उनके प्रिय भक्त उद्धव के बीच संवाद वर्णित है। इस संवाद में भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव को संसार की असारता, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और आत्मा के परम स्वरूप का उपदेश दिया।
यह संवाद "उद्धव गीता" के नाम से प्रसिद्ध है और यह श्रीमद्भागवत में उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि भगवद्गीता। भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका छोड़ने से पहले उद्धव को धर्म, भक्ति और मोक्ष का गहन ज्ञान प्रदान किया।
कृष्ण-उद्धव संवाद की पृष्ठभूमि
जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि यदुवंश का विनाश निकट है और उनकी लीला पूर्ण होने वाली है, तो उन्होंने उद्धव को बुलाकर कहा कि वे अब अपनी लीला समाप्त कर वैकुंठ लौटने वाले हैं। उद्धव ने भगवान से निवेदन किया कि वे भी भगवान के साथ जाएं। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें भक्ति, वैराग्य और ज्ञान का उपदेश दिया।
कृष्ण-उद्धव संवाद के मुख्य विषय
1. संसार की असारता
भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव को समझाया कि यह संसार माया के प्रभाव से चलता है। यह एक स्वप्न के समान है, जो वास्तविक नहीं है।
श्लोक:यदा मनो हृषीकेषे न त्वसक्तं निरङ्कुशम्।धर्मं कामार्थमोक्षांश्च हन्ति शीघ्रं निवर्तते॥(श्रीमद्भागवत 11.7.20)
अर्थ: जब मनुष्य का मन भगवान श्रीकृष्ण में स्थिर हो जाता है और माया के बंधनों से मुक्त हो जाता है, तब वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से भी परे हो जाता है।
2. भक्ति का महत्व
भगवान ने उद्धव को बताया कि केवल भक्ति के द्वारा ही मनुष्य माया को पार कर सकता है और भगवान को प्राप्त कर सकता है।
श्लोक:मय्यावेश्य मनः कृत्स्नं विमुक्तः सर्वतो भिया।निवार्य सर्वकामान् यः शरणं मे प्रयाति सः॥(श्रीमद्भागवत 11.11.18)
अर्थ: जो व्यक्ति अपने मन को मुझमें एकाग्र करता है और सभी इच्छाओं का त्याग कर मेरी शरण में आता है, वह मुक्त हो जाता है।
3. माया और आत्मज्ञान
भगवान ने माया का स्वरूप समझाते हुए कहा कि माया ही मनुष्य को संसार में बांधती है। आत्मज्ञान से ही माया का नाश होता है।
श्लोक:आत्ममायां समाविश्य सोऽसृजत्स्त्रीपुमान्न्ययम्।नानारूपविकारं च विजहौ प्रकृतौ स्थितः॥(श्रीमद्भागवत 11.9.19)
अर्थ: भगवान ने अपनी माया से संसार की रचना की और प्रकृति के माध्यम से इसे चलाया।
4. योग और ध्यान का महत्व
भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव को योग और ध्यान के माध्यम से आत्मा को जानने का मार्ग बताया।
श्लोक:युक्त आसीनमत्यन्तं विन्यस्ताक्षं निराशिषम्।ध्यायतो मायया वेष्टं व्युदस्तं समुपेहि माम्॥(श्रीमद्भागवत 11.14.21)
अर्थ: जो योगी मेरी भक्ति में स्थिर रहता है और संसार की आसक्तियों को छोड़ देता है, वह मुझे प्राप्त करता है।
5. भक्तों के लक्षण
भगवान श्रीकृष्ण ने सच्चे भक्तों के गुणों का वर्णन किया।
श्लोक:तितिक्षवः कारुणिकाः सुहृदः सर्वदेहिनाम्।अजातशत्रवः शान्ताः साधवः साधुभूषणाः॥(श्रीमद्भागवत 11.11.29)
अर्थ: सच्चे भक्त सहनशील, करुणामय, सभी जीवों के मित्र, शांत और दूसरों के प्रति द्वेषभाव से रहित होते हैं।
6. कर्मयोग और ज्ञानयोग
भगवान ने कर्मयोग और ज्ञानयोग का महत्व बताते हुए कहा कि यह दोनों भक्ति के मार्ग को सशक्त करते हैं।
श्लोक:स्वधर्मनिष्ठः शतजन्मभिः पुमान्विरिञ्चत्वमिति श्रुतिः।तदीयतां वा विशतेस्तु यद्विदांचिरं विधूतं भगवत्पदं यथा॥(श्रीमद्भागवत 11.20.32)
अर्थ: जो व्यक्ति अपने धर्म का पालन करते हुए भगवान की भक्ति करता है, वह धीरे-धीरे भगवत्प्राप्ति के योग्य बन जाता है।
7. संन्यास और वैराग्य का महत्व
भगवान ने उद्धव को वैराग्य का महत्व बताते हुए कहा कि संसार की वस्तुएं नाशवान हैं। केवल भगवान के चरण ही शाश्वत हैं।
श्लोक:न ह्यत: परमानन्दो देहेऽस्मिन्प्रमत: क्वचित्।गृहेषु जन्तु: सुखमात्मनि मेनिरे॥(श्रीमद्भागवत 11.19.17)
अर्थ: इस शरीर में या घर में सच्चा आनंद नहीं है। सच्चा सुख केवल आत्मा और भगवान में है।
8. कलियुग में भक्ति का महत्व
भगवान ने बताया कि कलियुग में केवल भक्ति और हरिनाम संकीर्तन ही मुक्ति का साधन है।
श्लोक:कलेर दोषनिधे राजन् अस्ति ह्येको महान् गुणः।कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्॥(श्रीमद्भागवत 12.3.51)
अर्थ: कलियुग में भगवान श्रीकृष्ण का कीर्तन ही मोक्ष का सबसे सरल मार्ग है।
उद्धव का वैराग्य
भगवान के उपदेश सुनने के बाद उद्धव ने संसार से वैराग्य धारण कर लिया और हिमालय के बद्रीनाथ क्षेत्र में तपस्या करने चले गए। उन्होंने भगवान के आदेश का पालन करते हुए आत्मज्ञान और भक्ति का प्रचार किया।
महत्व और संदेश
- भक्ति का सर्वोच्च स्थान: उद्धव गीता यह सिखाती है कि भक्ति, आत्मज्ञान, और वैराग्य के बिना मोक्ष संभव नहीं है।
- संसार की असारता: भगवान ने उद्धव को यह समझाया कि संसार केवल माया का खेल है, और इसे पार करना भक्ति के बिना असंभव है।
- भगवान का शरणागति मार्ग: भगवान ने बताया कि उनकी शरण में आने वाला हर भक्त माया के बंधन से मुक्त हो जाता है।
- हरिनाम संकीर्तन का महत्व: कलियुग में भगवान के नाम का स्मरण ही मोक्ष प्राप्ति का सबसे सरल मार्ग है।
निष्कर्ष
कृष्ण-उद्धव संवाद जीवन के हर पहलू पर गहन दृष्टिकोण देता है। यह हमें सिखाता है कि भक्ति, ज्ञान, और वैराग्य के माध्यम से ही भगवान को प्राप्त किया जा सकता है। यह संवाद संसार के मोह से मुक्त होकर आत्मा के परम सत्य को जानने और भगवान की शरण में रहने की प्रेरणा देता है।
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