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भागवत कथा: परीक्षित को शुकदेव जी के अंतिम उपदेश |
भागवत कथा: परीक्षित को शुकदेव जी के अंतिम उपदेश
श्रीमद्भागवत महापुराण में राजा परीक्षित और महर्षि शुकदेव जी का संवाद सबसे महत्वपूर्ण और गहन दार्शनिक महत्व रखता है। परीक्षित को मृत्यु के भय से ज्ञान की खोज हुई, और उन्होंने शुकदेव जी से यह जानने की जिज्ञासा प्रकट की कि मृत्यु के समय मनुष्य को क्या करना चाहिए।
महर्षि शुकदेव जी ने उन्हें भागवत पुराण के माध्यम से आत्मज्ञान, भक्ति और जीवन के अंतिम सत्य का बोध कराया। उनके अंतिम उपदेश श्रीमद्भागवत के बारहवें स्कंध में वर्णित हैं, जिसमें उन्होंने परीक्षित को यह सिखाया कि मृत्यु के समय भगवान का स्मरण और उनकी कथा का श्रवण ही सबसे महत्वपूर्ण है।
परीक्षित को शुकदेव जी के अंतिम उपदेश:
1. मृत्यु का स्वीकार और भक्ति का महत्व:
शुकदेव जी ने परीक्षित को बताया कि मृत्यु जीवन का स्वाभाविक और अपरिहार्य अंग है। इस संसार में कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है। मृत्यु के समय केवल भगवान का स्मरण और उनकी कथा का श्रवण ही जीव को मोक्ष प्रदान कर सकता है।
श्लोक: "तस्मात्सर्वात्मना राजन् हृषीकेशं गिरिशं यजेत्। श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं पादसेवनम्॥" (श्रीमद्भागवत 12.3.9)
अर्थ: "हे राजन्! हृषीकेश (भगवान श्रीकृष्ण) की सेवा, उनके नाम का कीर्तन, श्रवण और स्मरण ही मृत्यु के समय का सबसे बड़ा कर्तव्य है।"
2. संसार की असारता और भक्ति का महत्व:
उन्होंने कहा कि यह संसार क्षणभंगुर है। यहां के सुख-दुख, संबंध और ऐश्वर्य सब नाशवान हैं। केवल भगवान के चरणों की शरण में ही सच्चा सुख है।
श्लोक: "संसार: स्थावरजंगम: स्वप्न इव प्रतीयते। एषां च मम चात्मानं परं ब्रह्म निराकृतम्॥" (श्रीमद्भागवत 12.4.8)
अर्थ: "यह संसार स्थावर और जंगम सब स्वप्न के समान प्रतीत होता है। केवल परम ब्रह्म ही सत्य है।"
3. मृत्यु का स्वागत और भगवान का स्मरण:
शुकदेव जी ने परीक्षित को बताया कि जब मृत्यु निकट हो, तो उसे भय के रूप में नहीं, बल्कि भगवान से मिलन के अवसर के रूप में देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि मृत्यु का समय भगवान की कथा सुनते हुए बिताना चाहिए।
श्लोक: "यदाऽऽत्मा स्वं परित्यज्य भवत्यभवकर्मणि। तदा स्मरेदच्युतं नाम सर्वदुःखौषधं नृणाम्॥" (श्रीमद्भागवत 12.6.9)
अर्थ: "मृत्यु के समय भगवान अच्युत का नाम स्मरण करना चाहिए, जो सभी दुखों का नाश करता है।"
4. कलियुग में भक्ति का महत्व:
शुकदेव जी ने बताया कि कलियुग में केवल भक्ति ही मोक्ष का साधन है। भगवान के नाम का कीर्तन सबसे सरल और प्रभावी मार्ग है।
श्लोक: "कलेर दोषनिधे राजन् अस्ति ह्येको महान् गुणः। कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्ग: परं व्रजेत्॥" (श्रीमद्भागवत 12.3.51)
अर्थ: "कलियुग में, जो दोषों से भरा है, भगवान श्रीकृष्ण का कीर्तन ही मोक्ष का सबसे सरल उपाय है।"
5. श्रीमद्भागवत का श्रवण:
शुकदेव जी ने परीक्षित को बताया कि श्रीमद्भागवत का श्रवण और मनन करने से आत्मा पवित्र होती है और यह मनुष्य को भगवान की शरण में ले जाता है।
श्लोक: "श्रीमद्भागवतं पुराणममलं यद्वैष्णवानां प्रियम्। यन्मुक्तये सर्वभूतानामन्यत्र कैवल्यहेतु:॥" (श्रीमद्भागवत 12.13.18)
अर्थ: "श्रीमद्भागवत सबसे पवित्र और प्रिय ग्रंथ है। यह जीवों को मोक्ष प्रदान करने वाला है।"
6. अंतिम क्षणों में भगवान के चरणों की शरण:
परीक्षित को यह समझाया गया कि अंतिम समय में भगवान के चरणों में समर्पण से जीव जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।
श्लोक: "अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:॥" (श्रीमद्भागवत 12.6.10)
अर्थ: "जो व्यक्ति मृत्यु के समय मेरा स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है, वह मेरे धाम को प्राप्त करता है। इसमें कोई संदेह नहीं।"
परीक्षित का मोक्ष:
शुकदेव जी के उपदेशों को सुनने के बाद, राजा परीक्षित ने सातवें दिन मृत्यु का सामना करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान किया। तक्षक नाग के दंश से उनके शरीर का अंत हुआ, लेकिन उनकी आत्मा ने भगवान के परमधाम को प्राप्त किया।
महत्वपूर्ण संदेश:
- मृत्यु का भय नहीं, स्वीकार करें: मृत्यु जीवन का अनिवार्य सत्य है। इसे भगवान से मिलन का अवसर मानकर स्वीकार करना चाहिए।
- भगवान का स्मरण: अंतिम समय में भगवान का नाम और उनकी कथा सुनना या गाना मोक्ष का सरल और प्रभावी मार्ग है।
- भक्ति की शक्ति: श्रीमद्भागवत भक्ति और मोक्ष का सर्वोत्तम साधन है। इसे सुनने और समझने से आत्मा शुद्ध होती है।
- कलियुग में हरिनाम की महिमा: कलियुग में भगवान का नाम लेना सबसे बड़ा धर्म है, जो मनुष्य को समस्त बंधनों से मुक्त करता है।
निष्कर्ष:
महर्षि शुकदेव जी के अंतिम उपदेश राजा परीक्षित को भक्ति, वैराग्य और आत्मज्ञान का गहन संदेश देते हैं। उन्होंने सिखाया कि जीवन का अंतिम लक्ष्य भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जाना है। परीक्षित ने शुकदेव जी के उपदेशों का पालन करते हुए मृत्यु का शांतिपूर्ण और भक्ति से परिपूर्ण स्वागत किया, और मोक्ष प्राप्त किया। श्रीमद्भागवत हमें सिखाता है कि भक्ति और भगवान का स्मरण ही जीवन का परम उद्देश्य है।
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