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ईशावास्योपनिषद्, मन्त्र और अर्थ के साथ

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ईशावास्योपनिषद्, मन्त्र और अर्थ के साथ,ईशावास्योपनिषद् का परिचय,मन्त्र 1-18, मूल पाठ,अर्थ,सारांश।ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।

ईशावास्योपनिषद् के आधार पर अद्भुत  चित्रणईशावास्योपनिषद्, मन्त्र और अर्थ के साथ
ईशावास्योपनिषद् के आधार पर अद्भुत  चित्रण।ईशावास्योपनिषद्, मन्त्र और अर्थ के साथ


ईशावास्योपनिषद्, मन्त्र और अर्थ के साथ

ईशावास्योपनिषद्  में कुल 18 मन्त्र (श्लोक) हैं। यह उपनिषद गूढ़ वेदांत विचारों का सार प्रस्तुत करता है। नीचे इन सभी मन्त्रों का मूल पाठ और अर्थ दिया गया है:


मन्त्र 1

मूल पाठ:
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।

अर्थ:
इस संसार में जो कुछ भी गतिशील या स्थिर है, वह ईश्वर से व्याप्त है। इसीलिए त्यागपूर्वक भोग करो और लोभ मत करो, क्योंकि किसी भी वस्तु पर तुम्हारा अधिकार नहीं है।


मन्त्र 2

मूल पाठ:
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।

अर्थ:
इस संसार में कर्म करते हुए सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करो। कर्म करते हुए जीने का यही उचित तरीका है, और इससे पाप तुम्हें स्पर्श नहीं करेगा।


मन्त्र 3

मूल पाठ:
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः।
ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः।

अर्थ:
जो लोग आत्मा की हत्या (आत्मज्ञान का अभाव) करते हैं, वे अज्ञान के अंधकारमय लोकों में जाते हैं।


मन्त्र 4

मूल पाठ:
अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत्।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति।

अर्थ:
परमात्मा निश्चल है, फिर भी वह मन से भी तेज है। वह सबके आगे है, और अन्य सब गतिशील वस्तुएं उसकी छत्रछाया में रहती हैं।


मन्त्र 5

मूल पाठ:
तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः।

अर्थ:
वह (परमात्मा) चलता है और नहीं चलता। वह दूर भी है और पास भी। वह सबके भीतर है और सबके बाहर भी।


ईशावास्योपनिषद्, मन्त्र और अर्थ के साथ

मन्त्र 6

मूल पाठ:
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते।

अर्थ:
जो व्यक्ति सभी प्राणियों को अपने आत्मा में देखता है और अपने आत्मा को सभी प्राणियों में देखता है, वह किसी से भी घृणा नहीं करता।


मन्त्र 7

मूल पाठ:
यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः।

अर्थ:
जिसने सभी प्राणियों को आत्मा में और आत्मा को सभी प्राणियों में एक ही रूप में देखा, उसके लिए मोह और शोक का कोई कारण नहीं रह जाता।


मन्त्र 8

मूल पाठ:
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्यथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः।

अर्थ:
परमात्मा सब जगह व्याप्त है। वह निर्मल, अजर, अविनाशी, बिना पाप के और शुद्ध है। वह सर्वज्ञ, स्वतंत्र और सबका स्रष्टा है।


मन्त्र 9

मूल पाठ:
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः।

अर्थ:
जो अज्ञान (कर्मकांड) का अनुसरण करते हैं, वे अंधकार में गिरते हैं। जो केवल ज्ञान का ही अनुसरण करते हैं, वे उससे भी अधिक गहरे अंधकार में जाते हैं।


मन्त्र 10

मूल पाठ:
अन्यदेवाहुर्विद्यया अन्यदाहुरविद्यया।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे।

अर्थ:
विद्या और अविद्या का फल अलग-अलग बताया गया है। ज्ञानीजन हमें इसके भेद को समझाते हैं।


मन्त्र 11

मूल पाठ:
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्यया अमृतमश्नुते।

अर्थ:
जो विद्या (ज्ञान) और अविद्या (कर्म) दोनों को जानता है, वह अज्ञान को पार करके मृत्यु से मुक्त हो जाता है और ज्ञान से अमरत्व को प्राप्त करता है।


मन्त्र 12

मूल पाठ:
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः।

अर्थ:
जो लोग केवल अज्ञान (अविद्या) का अनुसरण करते हैं, वे अंधकार में गिरते हैं। लेकिन जो केवल ज्ञान (विद्या) का अनुसरण करते हैं, वे उससे भी अधिक गहरे अंधकार में चले जाते हैं।

व्याख्या:
यह मन्त्र यह स्पष्ट करता है कि अज्ञान (अविद्या) और ज्ञान (विद्या) दोनों का अलग-अलग पालन करना जीवन के लिए घातक हो सकता है।

  • अविद्या: इसका तात्पर्य कर्मकांड और सांसारिक गतिविधियों से है।
  • विद्या: इसका तात्पर्य केवल आध्यात्मिक ज्ञान या ध्यान से है।

यह मन्त्र कर्म और ज्ञान के संतुलन का महत्व बताता है। केवल भौतिक गतिविधियों या केवल आध्यात्मिक साधना में लिप्त रहना मानव जीवन को अधूरा बना देता है।


ईशावास्योपनिषद्, मन्त्र और अर्थ के साथ

मन्त्र 13

मूल पाठ:
अन्यदेवाहुर्विद्यया अन्यदाहुरविद्यया।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे।

अर्थ:
ज्ञानीजनों से हमने सुना है कि विद्या (ज्ञान) और अविद्या (कर्म) के फल भिन्न होते हैं।

व्याख्या:
इस मन्त्र में यह कहा गया है कि विद्या और अविद्या दोनों अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके लक्ष्य और परिणाम भिन्न हैं।

  • विद्या: परम सत्य का अनुभव, आत्मज्ञान।
  • अविद्या: संसार के प्रति कर्तव्य और कर्म का पालन।

दोनों का सामंजस्य जीवन को पूर्ण बनाता है।


मन्त्र 14

मूल पाठ:
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्यया अमृतमश्नुते।

अर्थ:
जो व्यक्ति विद्या (आत्मज्ञान) और अविद्या (कर्म) दोनों को एक साथ समझता है, वह अज्ञान के अंधकार (मृत्यु) को पार कर जाता है और ज्ञान से अमरत्व को प्राप्त करता है।

व्याख्या:
यह मन्त्र ज्ञान और कर्म दोनों के महत्व को रेखांकित करता है।

  • अविद्या (कर्म) मृत्यु के बंधन से मुक्ति का साधन है।
  • विद्या (ज्ञान) अमरत्व या मोक्ष का साधन है।

संदेश यह है कि व्यक्ति को अपने सांसारिक कर्तव्यों (अविद्या) का पालन करते हुए आध्यात्मिक ज्ञान (विद्या) की ओर भी अग्रसर होना चाहिए।


मन्त्र 15

मूल पाठ:
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये।

अर्थ:
सत्य का मुख स्वर्णिम आवरण (हिरण्मय पात्र) से ढका हुआ है। हे पूषण (सूर्य), उसे हटा दो ताकि मैं सत्यधर्म (सत्य का वास्तविक स्वरूप) को देख सकूं।

व्याख्या:
यह मन्त्र एक प्रतीकात्मक प्रार्थना है। "हिरण्मय पात्र" से तात्पर्य उन आवरणों से है जो आत्मा और सत्य के बीच बाधा उत्पन्न करते हैं, जैसे अहंकार, अज्ञान, और सांसारिक मोह। सत्य को देखने के लिए इन आवरणों को हटाना आवश्यक है। यह शुद्ध आत्मा की परमात्मा से एक होने की प्रार्थना है।


मन्त्र 16

मूल पाठ:
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह।
तेजो यत् ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि।

अर्थ:
हे पूषण (सूर्य), जो सबके रक्षक और एकमात्र गति हैं, हे प्रजापति के पुत्र, कृपया अपनी किरणों को समेट लें। मैं आपके शुभ और दिव्य स्वरूप को देखना चाहता हूँ। जो तेजोमय पुरुष (परमात्मा) है, वही मैं हूँ।

व्याख्या:
यह मन्त्र आत्मा और परमात्मा की एकता की अनुभूति को प्रकट करता है। साधक सूर्य से प्रार्थना करता है कि उसकी तेजस्वी किरणें, जो सत्य के दर्शन में बाधा डालती हैं, हटा दी जाएं ताकि परमात्मा के दिव्य स्वरूप का अनुभव हो सके। "सोऽहमस्मि" का अर्थ है "वही मैं हूँ," जो अद्वैत वेदांत का मुख्य सिद्धांत है।


मन्त्र 17

मूल पाठ:
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।
ओं क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर।

अर्थ:
वायु (प्राण) अमर है और यह शरीर अंततः भस्म हो जाएगा। हे मन, अपने कर्मों को स्मरण कर, अपने कर्तव्यों को स्मरण कर।

व्याख्या:
यह मन्त्र मृत्यु के समय की स्थिति का वर्णन करता है। शरीर नश्वर है और इसे जलकर भस्म हो जाना है, लेकिन प्राण और आत्मा अमर हैं। मृत्यु के समय साधक को अपने जीवन के सत्कर्मों और ईश्वर के ध्यान को स्मरण करना चाहिए। यह मन्त्र व्यक्ति को मृत्यु का स्वागत आत्मिक जागरूकता और संतोष के साथ करने की प्रेरणा देता है।


मन्त्र 18

मूल पाठ:
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम।

अर्थ:
हे अग्नि (ईश्वर), हमें शुभ मार्ग से ले चलो। हे ज्ञानस्वरूप देव, आप हमारे सभी पापों को दूर करें। हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं और आपकी कृपा के लिए प्रार्थना करते हैं।

व्याख्या:
यह अन्तिम मन्त्र साधक की ईश्वर से अंतिम प्रार्थना है। अग्नि को यहाँ ज्ञान, प्रकाश, और मोक्ष का प्रतीक माना गया है। साधक ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उसे शुभ कर्मों और सद्गुणों के पथ पर ले जाया जाए और सभी दोषों और पापों को दूर किया जाए।


सारांश:

ईशावास्योपनिषद् के मन्त्र  मृत्यु के समय आत्मा की यात्रा, आत्मा और परमात्मा की एकता, और मोक्ष प्राप्ति की प्रार्थना से संबंधित हैं। ये मन्त्र आत्मा की शुद्धता, कर्मों के स्मरण, और परम सत्य के साक्षात्कार की ओर प्रेरित करते हैं। ईशावास्योपनिषद्, मन्त्र और अर्थ के साथ यह काफी उपयोगी हो सकता है।

नोट -

ईशावास्योपनिषद्, मन्त्र और अर्थ के साथ यहाँ प्रस्तुत है। ईशावास्योपनिषद्, मन्त्र और अर्थ के साथ और अधिक विश्लेषण के लिए सर्च बॉक्स में सर्च करें ।

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