भूत का वृंदावन

SOORAJ KRISHNA SHASTRI
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 जब रसिक संत की कृपा से एक भूत को भी हुई दिव्य वृंदावन की प्राप्ति –

 श्री निम्बार्क सम्प्रदाय के एक रसिक संत हुए है श्री हरिवंश देवाचार्य जी महाराज ।

 एक बार वे युगल नाम का जप करते करते भरतपुर से गोवर्धन जा रहे थे ।

राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे ।

राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे ।।

 बीच के एक गांव मे उन्होंने देखा की एक युवक को कुछ लोग चप्पल जूतों से पीट रहे है । श्री हरिवंश देवाचार्य जी ने उन लोगो से पूछा की इस युवक को चप्पलों से क्यो पीटा जा रहा है ? लोगो ने बताया की इसपर प्रेत चढ़ गया है और हम इसको लेकर गांव की सीमा पर रहने वाले एक अघोरी के पास लेकर प्रेत उतरवाने जा रहे है ।

 अघोरी अपने उपास्य देवता को मांस और शराब का भोग लगता है और तंत्र क्रिया से भूत को उतरवा देता है ।

 संत ने कहा – क्या मै इस युवक पर चढ़ा हुआ भूत उतार दूं ? लोगो ने कहां – इस गांव मे महीने मे एक दो बार किसी न किसको भूत पकड़ लेता है । आप तो आज इसका भूत उतारकर चले जाओगे पर कहीं उस अघोरी को इस बात का पता चल गया तो फिर वह नाराज हो जाएगा और किसीका भूत नही उतरवायेगा ।

 संत ने कहा देखो इस युवक की अवस्था तो बहुत दयनीय हो गयी है यदि अभी इसका भूत नही उतारा तो यह मर भी सकता है, तुम उस अघोरी को मत बताना पर इसका भूत मुझे उतारने दो । लोगो ने कहां चलो ठीक है आप ही इसका भूत उतरवा दो ।

 श्री हरिवंश देवाचार्य जी ने अपना सीधा हाथ उसके मस्तक से लगाकर कहां की यदि मैने श्री वृंदावन की उपासना सच्चे हृदय से की है । यदि मेरी इस उपासना की कथनी और करनी मे कोई अंतर नही है तो यह भूत इसको तत्काल छोड़ दे । वह भूत उसी क्षण सामने आकर खड़ा हो गया और कहने लगा – संत जी आप मुझपर कृपा करें, मुझे इस योनि मे बहुत कष्ट होता है । आपके इस युवक को स्पर्श करने के कारण और आपके दर्शन से मेरी पीड़ा शांत हो गयी है ।

 श्री हरिवंश देवाचार्य जी ने पूछा – तुम यहाँ के लोगो को क्यों बार बार पकड़ते हो ?

  भूत ने कहा – अघोरी के मन मे मांस और शराब पाने की लालसा होती है । वह अघोरी लोगो को मांस और शराब के बारे मे अच्छी बातें बताकर उन्हे खिला पिला देता है । ऐसे आहार से उन लोगो का शरीर अपवित्र हो जाता है और मै उनको बहुत ही सरलता से पकड़ लेता हूं । इस तरह वह अघोरी मुझसे काम करवाता है । बहुत पाप करने के कारण मै इस योनि मे पड गया हूं पर जब मै जीवित था उस समय एक बार मैने संतो से श्रीवृंदावन की महिमा सुनी थी । आप मुझपर कृपा करो ।

संत ने पूछा – कैसे कृपा करूँ ?

  भूत बोला – आप जैसे रसिक संत की चरण रज ही वृंदावन की प्राप्ति करवा सकती है, आप कृपा करके अपने दाहिने चरण की रज प्रदान करो । संत ने जैसे ही सुना की यह भूत वृंदावन प्राप्त करने की इच्छा रखता है , वे प्रसन्न हो गए । पास खड़े लोगो ने हंसते हुए भूत से कहां –

 अरे तुम तो बड़े मूर्ख मालूम पड़ते हो । यहां नीचे झुककर स्वयं ही अपने हाथ से रज प्राप्त कर लो । इसपर भूत ने अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही ।

 भूत ने कहा – दो प्रकार के व्यक्तियों को संतो की चरण रज प्राप्त नही हो सकती , एक अभिमानी और दूसरा पापी ।

 अभिमानी कभी संत के सामने झुकता नही और पापी व्यक्ति तो संत की किसी वस्तु का स्पर्श तक नही कर सकता । यदि संत अपनी ओर से कृपा करके उनकी चरण रज लेने की आज्ञा दे तब ही पापी को रज प्राप्त हो सकती है । यदि संत अनुमति देकर अपनी चरण रज लेने की आज्ञा देंगे तभी मै उसको स्पर्श कर सकूंगा । इस बात को सुनकर श्री हरिवंश देवाचार्य जी का हृदय द्रवित हो गया और उन्होंने अपना चरण उठाकर कहां – इस पदरज को लेकर अपने मस्तक से लगा । भूत ने जैसे ही उनकी पदरज अपने मस्तक से लगायी वैसे ही उसने दिव्य शरीर धारण कर लिया और उसने संत को प्रणाम करके कहां की आपकी कृपा से मै श्रीवृंदावन को जा रहा हूँ ।

 इस घटना मे भूत के द्वारा २ महत्वपूर्ण बातें बताई गई थी –

 १. अपवित्र अवस्था मे रहने वाले और अपवित्र वस्तुओं का सेवन करने वाले व्यक्तियों को भूत प्रेत सरलता से पकड़ सकते है।

 २. दो प्रकार के व्यक्तियों को संतो की चरण रज प्राप्त नही हो सकती , एक अभिमानी और दूसरा पापी । संत की अनुमति के बिना पापी व्यक्ति संत की किसी भी वस्तु का स्पर्श तक नह कर सकता ।

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